शिमला। हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकार के उस निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी, जिसके तहत अस्थायी तौर पर कार्यरत प्राइमरी शिक्षकों को नियमितीकरण का लाभ लेने से पहले दो वर्षीय डिप्लोमा ट्रेनिंग की शर्त रखी थी। हाईकोर्ट ने ऐसे अस्थायी शिक्षकों की याचिकाओं को खारिज कर दिया जिसके तहत उन्होंने सरकार के इस फैसले को चुनौती दी थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तिरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया कि इससे प्रार्थियों के किसी भी अधिकार का हनन नहीं हुआ है।
ज्ञात रहे कि 7 और 9 दिसंबर 2013 को शिक्षा विभाग ने निर्णय लिया था कि जो अस्थायी अप्रशिक्षित अध्यापक पहली से पांचवीं कक्षा तक पढ़ा रहे हैं, उन्हें नेशनल काउंसिल ऑफ टीचर एजूकेशन की ओर से सुझाए गए संस्थानों से दो वर्षीय डिप्लोमा ट्रेनिंग करनी होगी। इस कोर्स के लिए अनिवार्य योग्यता दस जमा दो में 50 फीसदी से अधिक अंक या स्नातक होना जरूरी था। प्रार्थियों ने सरकार के इस निर्णय को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी कि जब उन्हें अस्थायी तौर पर नियुक्त किया गया था तो नियमितीकरण के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं थी। प्रार्थियों ने दलील दी थी कि वे समय-समय पर विभाग के माध्यम से प्रशिक्षण ले रहे हैं। इसलिए उन्हें अब इस प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि शिक्षा के स्तर को बनाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों का होना अनिवार्य है।