शिमला। प्रसिद्ध साहित्यकार एवं लेखक सतीश जायसवाल ने कहा कि रचनाकार जिस देश या स्थान से संबंध रखता है, चाहे वह रहे कहीं भी, उसकी रचना में स्थानीयता का रंग सर्वत्र बना रहता है। इसे रचनाकार की कमजोरी नहीं मानना चाहिए। रचनाकार काल और स्थान के इस वैशिष्टय के कारण ही रचना में कालजयी तत्वों का समावेश कर लेता है। छत्तीसगढ़ से आए सतीश जायसवाल हिमाचल विश्वविद्यालय में शनिवार को सतत व्याख्यान माला आयोजन में संबोधित कर रहे थे। अध्यक्षता प्रो. एडीएन बाजपेयी ने की। संचालन एवं समीक्षा प्रो. आरएन मेहता ने की।
जायसवाल ने ‘रचना साहित्य में स्थानीयता बोध’ विषय पर व्याख्यान में अपनी बात को पुष्ट करते हुए हिमाचल के कई कहानीकारों जैसे चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, निर्मल वर्मा के अलावा एसआर हरनोट के दृष्टांत दिए। प्रो. आरएन मेहता ने कहा कि रचना में काल और स्थानबद्ध रूप में नहीं होने चाहिए, बल्कि ऐसे संवेदित होने चाहिए कि वे संपूर्ण विश्व के लगते हों। प्रो. एडीएन बाजपेयी ने कहा कि साहित्य वही चिरंजीवी हो सकता है जो काल के थपेड़ों से मंजकर हर युग में पाठकों को उद्वेलित करे। अध्ययन अधिष्ठाता एसएस चौहान ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। आचार्य टीसी भल्ला सहित अन्य गणमान्य लोग भी यहां मौजूद रहे।
थर्ड जेंडर के लिए किन्नर शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति
सतीश जायसवाल ने थर्ड जेंडर के लिए किन्नर शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि क्या हिमाचल के किन्नौर मेें कोई नहीं है जो इसका विरोध करे। यह पौराणिक जाति रही है। साहित्य के द्वारा भी इसका प्रतिकार होना चाहिए।