शिमला। मुंह मांगे दाम देने के बावजूद क्या मरीज को क्वालिटी ड्रग्स मिल पा रही है? इस पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। सेमडिकोट के दावे पर यकीन करे तो बड़ी फार्मास्युटिकल्स फर्म सस्ती दवा तैयार करने के लिए आगे एक एक कमरे में चलने वाली मैन्यूफेक्चरिंग यूनिट को काम दे देती हैं। दवाओं की गुणवत्ता संदेह के घेरे में हैं। स्टेट ड्रग्स कंट्रोलर का दावा है हिमाचल में एक कमरे वाली मैन्युफेक्चरिंग यूनिट कहीं नहीं है। यहां सात सौ के करीब फार्मास्यूटिक्लस फर्म हैं और टाइम टू टाइम यहां बनने वाली दवाओं के सैंपल लिए जाते हैं जो दरूस्त हैं।
स्टेट एसोसिएशन आफ मेडिकल एंड डेंटल कालेज टीचर के अध्यक्ष डा. अनिल ओहरी ने कहा भगवान मालिक है मरीज कैसे ठीक हो जाता है। दवाओं को कम कीमत पर तैयार करने के लिए कुछ बड़ी फार्मास्युटिकल्स फर्म दवा बनाने के लिए आगे ठेका दे देती है। ये फार्मास्युटिकल्स कंपनियां जरूरत के मुताबिक हाल सेल मार्केट से दवाओं का केमिकल खरीद लेती हैं और ऐसे लोगों को आगे ठेका दे देती है जो एक कमरे में कुछ छोटी मशीनें रहती है पूरी तरह से वहां अनहाइजीएनियक सिस्टम रहता है। इसके बाद यहां कैप्सूल में पाउडर भरने या गोलियां बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ये काम लेबर क्लास से लिया जाता है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि एक अनपढ़ आदमी जो कैप्सूल और गोलियां बना रहा है वह मात्रा और ड्रग्स की क्वालिटी को कैसे मेंटेन कर पाऐगा। डाक्टर दवा लिख रहे हैं अब ऐसी दवा का सेवन करने वाले मरीज का मालिक भगवान ही है।
टेस्टिंग के बाद मार्र्केट में आए मेडिसन - पूर्व स्वास्थ्य निदेशक
सेवानिवृत्त स्वास्थ्य निदेशक डा. सुलक्षणा पूरी ने कहा कि ड्रग्स की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर जेनरिक पैरासिटामॉल की गोली 25 पैसे की हैं। गोली में साल्ट की क्वालिटी बेहतर होनी चाहिए तभी गोली असर दिखाऐगी। यह सही है कि कुछ फार्मास्युटिकल्स दवा बनाने के लिए आगे काम दे देती है। मार्केट में दवा के आने से पहले इसकी टेस्टिंग कई चरणों में होनी चाहिए केवल औपचारिकता मात्र न हो तभी मार्केट में मरीजों को क्वालिटी मेडिसन मिल सकती है। टेस्टिंग प्रक्रिया को ठोस करने की जरूरत है।
साल में दवा के हजार सैंपल भरे, फेल सात
ड्रग कंट्रोलर की फार्मास्यूटिक्लस को क्लीन चिट
नियमों के मुताबिक होती है कार्रवाई
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। हिमाचल में करीब सात सौ फार्मास्युटिकल्स फर्म दवा बनाने का काम कर रही है। अधिकांश फर्म बद्दी , काला अंब , परवाणु और पांवटा साहिब में चल रही हैं। यहां बन रही दवाओं की गुणवत्ता को परखने का जिम्मा स्टेट ड्रग कंट्रोलर के अधीन रहता है। ड्रग कंट्रोलर के दावे पर यकीन करें तो हर माह प्रत्येक ड्रग इंस्पेक्टर अलग अलग जगह से 10 से 12 सैंपल लेता है। साल में औसतन एक हजार दवा के सैंपल ले लिए जाते हैं लेकिन इसमें मात्र छह या सात ही सब स्टेंडर्ड निकले हैं।
महकमे का दावा है कि मार्केट में बिक रही सभी दवाएं बेहतर क्वालिटी की हैं। सैंपल की रिपोर्ट इसका साक्ष्य है। केवल दवा की क्वालिटी पर कंट्रोल कर सकते हैं। एमआरपी पर नियंत्रण उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इस दावे का मतलब है कि हिमाचल में चल रही सभी फार्मास्यूटिकल्स फर्म बेहतर दवाएं बना रही हैं। स्टेट ड्रग कंट्रोलर की क्लीन चिट से यह साफ जाहिर हो रहा है कि मरीज बेहतर क्वालिटी की दवा का सेवन कर रहे हैं।
गुणवत्ता पर समझौता नहीं- मरवाह
स्टेट ड्रग कंट्रोलर नवनीत मरवाह ने कहा कि दवा की गुणवत्ता को नियमित तौर पर जांचा जा रहा है। एक साल में करीब एक हजार दवाओं के सैंपल लिए गए हैं इनमें से केवल छह सात ही सब स्टेंडर्ड मिले। ़जो फार्मास्यूटिकल्स फर्म नियमों को ताक पर रखकर काम करती पाई जाऐगी उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। कार्रवाई होती भी रही हैं।
ड्रग कंट्रोलर आफिशियल, केमिस्ट और मेन्युफेक्चरर के बीच एक बड़ा नेक्सेस
एसोसिएशन के महासचिव डा. राजेश कश्यप ने कहा ड्रग कंट्रोलर आफिशियल, केमिस्ट और मेन्युफेक्चरर के बीच एक बड़ा नेक्सेस है। जीवन रक्षक दवाओं के मूल्य फिक्स क्यों नहीं करते जैसे 1990 से पहले थे। जीवन रक्षक दवाओं, सर्जिकल आइटम, हार्ट अटैक, स्ट्रोक, कैंसर की दवाएं इतनी मंहगी क्यों हैं? इसकी कीमत पर नियंत्रण क्यों नहीं किया जा रहा?
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एक ही दवा की अलग-अलग कीमत
सेमडिकोट ने एक एंटी बाइटिक इंजेक्शन के तीन सैंपल सामने रखे। इसमें दो इंजेक्शन एक ही ब्रांडेड कंपनी के थे। इनमें कंपनी ने जेनरिक ब्रांड के इंजेक्शन का रेट 37.50 पैसे है और ओपन मार्केट में बिकने वाला सेम इंजेक्शन 74.18 पैसे का है। तीसरा इंजेक्शन जन औषधि केंद्र से लिया गया, वहां इंजेक्शन 37 रुपये 50 पैसे का दिया गया। तीनों इंजेक्शन के बिल पदाधिकारियों ने प्रेस वार्ता के दौरान रखे और कहा कि इसमें कहां डाक्टर की गलती है? अपनी गलती छिपाने के लिए डाक्टरों को निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें बदनाम किया जा रहा है। अगर इस इंजेक्शन के टेंडर अस्पताल कॉल करे तो यह मरीज को 10 से 12 रुपये में मिलेगा।
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2 रुपये की दवा 80 में
जेनरिक की परिभाषा साफ नहीं है। पेन किलर में कंबिनेशन कैसे बनाएंगे? मेन्युफेक्चरर को किसी दवा का एक पत्ता 2 रुपये में तैयार हो रहा है और केमिस्ट शाप तक वह पांच रुपये में पहुंच रहा है। उस पर एमआरपी 80 रुपये है। इस कीमत को सरकार ही नियंत्रित कर सकती है। ड्रग डायरेक्टर जनरल आफ ड्रग कंट्रोल खुद कंफ्यूज्ड हैं। वह खुद कह रहे हैं कि एक्सपोर्ट क्वालिटी ब्रांडेड होनी चाहिए। ऐसे में यहां सरकार निर्देश दे रही है कि ब्रांडेड और कीमती दवा न लिखें।
दवाआें की कीमत पर नियंत्रण करो
दवाओं की गुणवत्ता जांचें और नियंत्रित करें
सभी स्वास्थ्य संस्थानों से सिविल सप्लाई की दवा दुकानें हटा दें