भारतीय महिलाएं सदियों से पर्यावरण की सच्ची संरक्षक रही हैं, कभी जंगलों से लिपटकर, तो कभी बीज बोकर। आइए जानते हैं पर्यावरण संरक्षण के लिए हुए चिपको आंदोलन में महिलाओं की भूमिका के बारे में।
चिपको आंदोलन
उत्तराखंड के रैणी गांव में 1973 में जब जंगलों की कटाई शुरू हुई, तब पुरुषों के बाहर होने पर गांव की महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उनका बचाव किया। इस आंदोलन की अगुवाई गौरा देवी ने की, जो आज पर्यावरण के क्षेत्र में महिलाओं के नेतृत्व की प्रतीक बन चुकी हैं।
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पेड़ हमारी मां जैसे हैं, इन्हें हम कटने नहीं देंगे।" गौरा देवी का ये नारा आज भी पर्यावरणीय आंदोलनों का प्रेरणा स्रोत है। चिपको आंदोलन सिर्फ पेड़ों को बचाने की मुहिम नहीं था, बल्कि यह महिलाओं के आत्म-सशक्तिकरण और सामुदायिक नेतृत्व का उदाहरण भी था।
ग्रामीण महिलाओं की हरियाली में भूमिका
भारत के कई हिस्सों में महिलाएं जंगल संरक्षण समितियों की प्रमुख होती हैं। वे जल संरक्षण, जैविक खेती, बीज बैंक, और सोलर ऊर्जा को अपनाकर पर्यावरण मित्र जीवनशैली को बढ़ावा दे रही हैं। राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्व भारत की कई ग्रामीण महिलाएं वनों की देखरेख, जल स्रोतों की सफाई, और स्थानीय जैव विविधता को संजोने का कार्य कर रही हैं।
आधुनिक महिला पर्यावरण योद्धा
आज की महिला पर्यावरण कार्यकर्ता आधुनिक तकनीक और जागरूकता के माध्यम से भी बड़ा बदलाव ला रही हैं,
- सुनिता नारायण पर्यावरण और नीति के क्षेत्र में अग्रणी हैं। वह सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की निदेशक हैं।
- मेडा पाटकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख हैं, जो विकास और पर्यावरण के संतुलन की वकालत करती हैं।
- तुलसी गौड़ा कर्नाटक की 'फॉरेस्ट वुमन' के नाम से मशहूर हैं। इन्होंने हज़ारों पेड़ लगाए हैं। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।