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Teachers Day 2023: सावित्रीबाई फुले मानी जाती हैं देश की पहली महिला शिक्षक, जानें कैसे मिली ये उपाधि

Tue, 05 Sep 2023 07:32 AM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

वो दौर दलितों के साथ भेदभाव का था। उन्हें शिक्षा का अधिकार नहीं था। महिलाओं को पढ़ाई की बिल्कुल अनुमति नहीं थी। ऐसे दौर में सावित्रीबाई फुले शिक्षा की दिशा में अग्रसर हुई।
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देश की पहली महिला शिक्षक - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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Teachers Day 2023: भारत में 5 सितंबर का दिन शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जाता है। शिक्षक राष्ट्र निर्माण में बहुत अहम योगदान निभाते हैं। शिक्षक दिवस मनाने की वजह भी देश के शिक्षकों को उनके योगदान और सराहनीय प्रयासों के लिए आभार व्यक्त करने और सम्मानित करने के उद्देश्य से मनाते हैं। शिक्षक दिवस डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को समर्पित है। डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 5 सितंबर को हुआ था। सर्वपल्ली राधाकृष्णन को एक उच्च कोटि के शिक्षक के तौर पर गिना जाता है।

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देश को कई दिग्गज शिक्षक मिले, जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाई। लेकिन क्या आपको पता है कि लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने का श्रेय एक महिला शिक्षिका को जाता है। इस महिला को देश की पहली शिक्षिका माना जाता है। आइए जानते हैं देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के बारे में, जिन्होंने बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास किया।

कौन हैं देश की पहली महिला शिक्षक

देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले थीं। सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र राज्य के सतना जिले के नायगांव में हुआ था।

सावित्रीबाई फुले की जीवन परिचय

वो दौर दलितों के साथ भेदभाव का था। उन्हें शिक्षा का अधिकार नहीं था। महिलाओं को पढ़ाई की बिल्कुल अनुमति नहीं थी। ऐसे दौर में सावित्रीबाई फुले शिक्षा की दिशा में अग्रसर हुई।
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जब वह छोटी थीं, जो उन्हें कहीं से एक अंग्रेजी किताब मिली। जब पिता ने सावित्रीबाई के हाथ में किताब देखी तो उसे छीन कर फेंक दिया। उनके पिता ने समझाया कि शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार सिर्फ उच्च जाति के पुरुषों को ही है। दलितों और खासकर स्त्रियों को पढ़ाई की इजाजत नहीं है।

सावित्रीबाई फुले की शिक्षा

बचपन में ही सावित्रीबाई फुले ने पढ़ाई करने की ठान ली थी। हालांकि महज 9 वर्ष की उम्र में उनका विवाह ज्योतिराव फुले से कर दिया गया। विवाह के समय सावित्रीबाई फुले अशिक्षित थी और उनके पति ज्योतिराव फुले तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। सावित्रीबाई ने जब पति के समक्ष शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा जाहिर की तो ज्योतिराव फुले ने उन्हें इसी इजाजत दी और पढ़ने के लिए स्कूल भेजा।

शादी के बाद स्कूल जाना सावित्रीबाई के लिए आसान नहीं थां। उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उन पर पत्थर फेंके गए। कूड़ा और कीचड़ डाला गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और स्कूल जाना जारी रखा।

पहला बालिका स्कूल

उन्होंने न केवल खुद पढ़ाई की, बल्कि अपने जैसी तमाम लड़कियों को शिक्षा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और मार्ग भी खोले। शिक्षा के लिए बालिकाओं को संघर्ष न करना पड़े, ये सोचकर सावित्रीबाई फुले ने साल 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश का पहला बालिका स्कूल स्थापित किया। एक-एक कर सावित्रीबाई फुले ने बालिकाओं के लिए 18 स्कूलों का निर्माण कराया।

शिक्षा को लेकर उनके प्रयासों के कारण सावित्रीबाई फुले को देश की पहली महिला शिक्षक माना जाता है। सावित्रीबाई फुले देश के पहले बालिका स्कूल की प्रधानाचार्या भी रहीं। 10 मार्च 1897 को 66 वर्ष की आयु में सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया।

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