बच्चों को उनकी निशुल्क पढ़ाई के लिए महर्षि आश्रम भेजने के बाद सुधा ने तंगी से निपटने के लिए नाबार्ड की मदद से दस भैंसों को कर्ज पर लिया। भैंसो के दूध को बेचने का व्यापार शुरू करते समय सुधा ने कभी नहीं सोचा था कि ये काम उन्हें इतना आगे तक ले जाएगा। धीरे-धीरे सुधा के इस काम के साथ दूसरी महिलाएं भी जुड़ने लगीं। साल 2010 में सुधा ने ऐसी महिलाओं का समूह बनाने का सोचा। लेकिन ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को मनाना मुश्किल था। हालांकि सुधा ने इस काम में भी कामयाबी हासिल की और गांव की महिलाओं को जोड़ लिया।
गांव की दूसरी महिलाओं को रोजगार देने वाली सुधा पिछले 15 सालों में डेयरी के क्षेत्र में काम कर रही हैं। सुधा के कार्य की सराहना करने के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार उन्हें गोकुल पुरस्कार से भी सम्मानित कर चुकी है। सुधा डेयरी के साथ ही कृषि के क्षेत्र में भी काम करती हैं। जिसमे उनका साथ पति और बेटे भी देते हैं। सुधा की कहानी उन महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं जो सीमित संसाधन के माध्यम से आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं।