साइकल का सफर
पाटण जिले (गुजरात) के एक छोटे से गांव जेसंगपुरा में एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली किंजल के घर में उनके पिताजी कभी कभार कार्यक्रमों में भजन और गरबे गाया करते थे। माँ सिलाई का काम करतीं। यह उस समय की बात है जब किंजल के पिता काम के लिए पूरे परिवार के साथ अहमदाबाद आ गए थे। नौकरी के साथ साथ किंजल के पिता गायकी भी करते और किंजल अक्सर उनके साथ कार्यक्रमों में जातीं और उन्हें गाते हुए सुनतीं।
लय, ताल और सुर का ज्ञान उन्हें यहीं से मिलना शुरू हुआ। मात्र 7-8 साल की उम्र से किंजल ने बकायदा अपने पिता के साथ गायत्री पाठ गाना शुरू कर दिया। यही उनकी संगीत की तालीम थी और यही रियाज। कार्यक्रमों में पहुंचने का सफर पूरा होता एक साइकल पर जो उनके परिवार में एकमात्र वाहन था। साइकल के पहियों पर समय का चक्र घूमा और थोड़ी बचत के बाद एक बाइक खरीदी गई लेकिन वह भी कुछ दिनों बाद चोरी हो गई। इस चुनौती ने किंजल को रोका नहीं। उन्होंने और मेहनत की और एक और बाइक खरीदी, आज वे सफलता के उस पायदान पर पहुंच गई हैं जहां महंगी चार पहिया गाड़ी वे आसानी से खरीद सकती हैं। आज किंजल 100 के करीब एलबम निकाल चुकी हैं, वे देश-विदेश में हज़ारों शो कर चुकी हैं और दुनियाभर में उनके फैंस हैं।
चेहर माँ पर आस्था
गरबे गाने का मुख्य ध्येय माँ की आराधना होती है। किंजल के गीतों में तो माँ की आराधना के सुर सुनाई देते ही हैं, वह स्वयं भी माँ की भक्त हैं। किंजल अपनी इस सारी सफलता का श्रेय चेहर माँ को देती हैं। वह मानती हैं कि आज वे जिस मुकाम पर हैं वह चेहर माँ के आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। केवल सिंगिंग ही नहीं, किंजल मॉडलिंग और अभिनय जैसी विधाओं में भी सफलता पा चुकी हैं। फैशन मॉडलिंग और नृत्य में भी उन्होंने खास पहचान बनाई है। नवरात्रि के दौरान किंजल के गाये गरबे पंडालों में नृत्य करने वाले कदमों में और भी उत्साह भर देते हैं और यह उत्साह साल दर साल बढ़ता जा रहा है।