किसी भी बच्चे के लिए खुद को दिव्यांग स्वीकार करना आसान नहीं होता, मगर प्राइमरी स्कूल में बच्चों को मैदान में खेलता-कूदता और खुद को एक ही स्थान पर बैठा देख निर्मला ने स्वीकार कर लिया कि वह अलग है, दिव्यांग है। उसी वक्त निर्मला ने खुद से एक वादा भी किया कि मैं कुछ अलग करूंगी, क्योंकि मैं पैरों से लाचार हूं, दिमाग से नहीं। बस, उनकी इसी स्वीकृति ने उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उत्तराखंड के नैनीताल जिले में हल्द्वानी की रहने वाली निर्मला मेहता भारतीय पैरा-एथलीट हैं। उन्होंने देश को बैडमिंटन और लॉन बॉल में 12 राष्ट्रीय और दो अंतरराष्ट्रीय पदक दिलाए हैं। साथ ही वह वर्ल्ड चैंपियनशिप और एशियन चैंपियनशिप का हिस्सा भी रही हैं।
निर्मला मेहता की कहानी
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर में जन्मीं निर्मला अपने माता-पिता की पहली संतान थी, लेकिन जब वह एक साल की हुईं, जब उन्हें पोलियो हो गया। इस कारण उनके शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे, इसलिए कई बार निर्मला को पड़ोसी के पास छोड़ कर काम पर जाना पड़ता। जिंदगी आसान नहीं थी, लेकिन असल चुनौती तब सामने आई, जब निर्मला स्कूल जाने योग्य हुईं।
निर्मला बताती हैं, “
मेरा व्यवहार बचपन से ही काफी मिलनसार रहा है। इस वजह से लोग खुशी से मेरी मदद करते रहे हैं। मेरी पढ़ाई पूरी कराने में भी इन मददगार लोगों का सबसे बड़ा हाथ है। असल में, जब मैं छोटी थी तो मेरे आस-पड़ोस के बच्चे मुझे अपनी पीठ पर बारी-बारी से बैठाकर स्कूल तक लेकर जाते थे। जब मैं थोड़ी बड़ी हुई तो मेरी कजिन, जिसके पास साइकिल थी, मुझे अपने साथ स्कूल ले जाने लगी।”
मुश्किलों के सामने कभी नहीं झुकीं निर्मला
जिंदगी की इन तमाम मुश्किलों के बीच निर्मला ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह अपने देश के लिए खेलेंगी। वह बताती हैं, “
मेरा हमेशा से सपना था आत्मनिर्भर बनने का, इसलिए मैंने एमए और बीएड किया। नौकरी पाने का ख्वाब लेकर मैं हल्द्वानी आई, पीजी में रही और टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) के लिए कोचिंग लेने लगी। टेस्ट मैं पास नहीं कर पाई, इसलिए एक घर को किराए पर लेकर उसमें पीजी चलाने लगी। एक दिन सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ने के दौरान खबर देखी कि पैरा ओलंपिक एसोसिएशन उत्तराखंड में स्टेट लेवल कंपटीशन करा रही है। खेल में मेरी ज्यादा रुचि नहीं थी, लेकिन मैं वहां गई कुछ नया करने और सीखने की सोच लेकर। मैं खेली और मुझे पहली ही बार में बैडमिंटन में सिल्वर मेडल मिला। इसके बाद मैं बैडमिंटन के बारे में सोचने लगी। कुछ समय बाद मैं बेंगलुरु गई स्टेट लेवल कंपटीशन में। वहां मुझे अपने उत्तराखंड के ही पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी मनोज सरकार मिले। उन्होंने मेरा खेल देखा और मुझसे कहा कि वह मुझे कोचिंग देंगे। इसके बाद मैंने लगातार राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई बैडमिंटन और लॉन बॉल प्रतियोगिताओं में भाग लिया। इस दौरान किसी में पदक हासिल कर सकी, किसी में नहीं, लेकिन मैंने खेल को ही अपनी दुनिया बना लिया।”
लाइब्रेरियन, मां और एथलीट हर रोल को बखूबी निभा रहीं निर्मला
निर्मला एक पैरा-एथलीट के साथ ही एक मां भी हैं। वह बताती हैं कि एक बार वह चार महीने की बेटी को अपनी मां और सहेली के पास छोड़कर नेशनल चैंपियनशिप खेलने उड़ीसा चली गईं। यह उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने दिल को मजबूत किया और दो कांस्य पदक जीते। फिलहाल निर्मला उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत हैं, मगर जब भी जहां भी कोई नेशनल और इंटरनेशनल कंपटीशन होता है, निर्मला वहां जाती हैं और खेलती हैं, अपने लिए, देश के लिए और अपनी बेटी के लिए।