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Budhari Tati: पद्मश्री बुधारी ताती कौन हैं, जिन्होंने अपने साधारण जीवन से असाधारण पहचान बनाई

Wed, 28 Jan 2026 03:04 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Budhari Tati Life Story : बुधारी ताती का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची सफलता चमक-दमक में नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत और विरासत को संभालने में होती है। पद्मश्री उनके लिए पुरस्कार नहीं, बल्कि एक जीवनभर की साधना की स्वीकृति है।
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बुधरी ताती - फोटो : instagram
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विस्तार
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Budhari Tati Life Story : भारत की असली ताकत उसके गांवों, परंपराओं और उन लोगों में छिपी है, जो बिना शोर किए पीढ़ियों की विरासत को ज़िंदा रखते हैं। बुधारी ताती ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जिन्हें पारंपरिक हथकरघा और बुनाई कला के संरक्षण और प्रचार के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया। उनकी कहानी संघर्ष, साधना और संस्कृति से जुड़ी एक प्रेरक गाथा है। बुधारी ताती का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची सफलता चमक-दमक में नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत और विरासत को संभालने में होती है। पद्मश्री उनके लिए पुरस्कार नहीं, बल्कि एक जीवनभर की साधना की स्वीकृति है।

 

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कौन हैं बुधारी ताती?

बुधारी ताती ओडिशा के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र से ताल्लुक रखती हैं। उनका जीवन हथकरघा बुनाई, खासतौर पर पारंपरिक कपड़ों और डिज़ाइनों को सहेजने में बीता। जब मशीनें और फैक्ट्री का दौर तेज़ हो रहा था, तब भी उन्होंने हाथ से बुने कपड़े की आत्मा को नहीं छोड़ा।


संघर्ष से सम्मान तक का सफर

बुधारी ताती का जीवन आसान नहीं रहा। सीमित संसाधन, आर्थिक तंगी और बाजार में हस्तनिर्मित कपड़ों की घटती मांग ये सब उनके जीवन की चुनौतियां बनीं। इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने न सिर्फ खुद बुनाई का काम जारी रखा, बल्कि नई पीढ़ी को भी यह कला सिखाई, ताकि परंपरा टूट न जाए।

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हथकरघा के लिए समर्पित जीवन

बुधारी ताती ने वर्षों तक पारंपरिक डिज़ाइन, प्राकृतिक रंगों और स्थानीय पहचान से जुड़े पैटर्न को जीवित रखा। उनका मानना था कि कपड़ा सिर्फ पहनने की चीज़ नहीं, बल्कि संस्कृति की भाषा होता है।


पद्मश्री सम्मान क्यों मिला?

भारत सरकार ने उन्हें यह सम्मान इसलिए दिया क्योंकि उन्होंने, 

  • पारंपरिक हथकरघा कला को बचाया

  • ग्रामीण महिलाओं को रोज़गार से जोड़ा

  • स्थानीय कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाई

  • सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया।

यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण भारत की कला का सम्मान है।

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