त्रावणकोर की झांसी की रानी
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त्रावणकोर के शाही महल के बाहर 23 अक्टूबर 1938 को हजारों की संख्या में लोग एकत्र हुए। उस दौरान पुलिस चीफ ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया तो चेरियन ने उनको ललकारते हुए कहा कि मैं इन सब की नेता हूं, पहली गोली मुझ पर चलाओ। ये प्रदर्शन तब तक चला, जब तक अंग्रेजी हुकूमत गिरफ्तार नेताओं को रिहा कराने के लिए राजी नहीं हो गईं।
त्रावणकोर की झांसी की रानी
अक्कम्मा चेरियन की बहादुरी और निडरता के कारण महात्मा गांधी ने उन्हें 'त्रावणकोर की झांसी की रानी' कहकर संबोधित किया। 1939 में प्रांतीय कांग्रेस के पहले अधिवेशन में चेरियन और उनकी बहन शामिल हुई थीं, जिसमें उनके साथ ही कई अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। वह 1942 में प्रांतीय कांग्रेस की कार्यवाहक अध्यक्ष बनीं। मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान हुआ तो चेरियन ने भी आवाज बुलंद की। आजादी के बाद 1947 में हुए पहले चुनाव के जरिए वह विधानसभा के लिए चुनी गईं। कुछ समय तक राजनीति में सक्रिय रहने के बाद 1982 में तिरुवनंतपुरम में चेरियन का निधन हो गया।