कौशिकी की आत्मा में बसा संगीत
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अद्भुत है कौशिकी का ऑरा
अपनी चमकती आँखों से किसी राग को बखान रहीं कौशिकी की पहली छवि ही किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी है। यह बाहरी खूबसूरती से कहीं आगे की बात है। खूबसूरत तो खैर कौशिकी हैं ही लेकिन मंच पर उनकी उपस्थिति उससे भी कहीं अधिक आकर्षक है। ठुमरी गाते-गाते जिस अंदाज से वो अपने हाथों को लय में झुलाते हुए संगतकारों से मुखातिब होती हैं उस समय ऐसा लगता है जैसे कोई टीनेज किशोरी, अल्हड़ अंदाज में किसी पेड़ की डाल पर बंधे झूले पर पेंग ले रही हो। कौशिकी की आवाज़ में जितनी मधुरता है उतनी ही उनके व्यक्तित्व में राजसी और गरिमामय ठसक है। शायद यही कारण रहा होगा कि एक समय उनके लिए बंगाली फिल्म में नायिका की भूमिका के लिए भी ऑफर आया था। अपनी इस चंचलता और सौम्यता के अद्भुत मिश्रण को कौशिकी भी जानती हैं और पूरी जीवन्तता से उसे जीती भी हैं। चाहे साड़ी पहनना हो या अन्य परिधान, वे अवसर के हिसाब से खुद को उतनी ही गरिमामय तरीके से ढालने में दक्ष हैं। इतना ही नहीं कौशिकी जानती हैं कि उनके संगीत की सर्थकता सुधिजनों से है और इसलिए वे कार्यक्रम \में श्रोताओं से बकायदा संवाद भी करती जाती हैं।
गर्भ में ही पक्की हो गई संगीत से मित्रता
कौशिकी के परिवार में संगीत एक परंपरा की तरह है, बल्कि कहें आदत की तरह। अपने पिता के साथ संगीत का रियाज करती नन्ही कौशिकी के वीडियो यूट्यब पर आसानी से देखने को मिल जायेंगे और ये गवाही हैं संगीत के उन संस्कारों की जो अब कौशिकी अपने पुत्र में डाल रही हैं।अगर यह कहा जाये की कौशिकी ने अपनी माँ के गर्भ में रहते ही संगीत को आत्मसात करना सीख लिया था तो गलत नहीं होगा। ख्यात हिंदुस्तानी शस्त्रीय संगीत गायक श्री अजय चक्रबर्ती की यह सुपुत्री कुछ महीने की उम्र में तानपुरे और हारमोनियम की आवाज़ सुनकर रोना बंद कर दिया करती थी और संगीत में रम जाया करती। जैसे ही कौशिकी ने होश संभाला, संगीत की शिक्षा प्रारम्भ हो गई।