महिला शक्ति: हर मोर्चे पर डटीं देश की बेटियां
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पिछले एक वर्ष में देश ने कोरोना महामारी और चमोली में जल प्रलय के रूप में दो विषम परिस्थितियां देखीं। इन हालात में देश को संभालने और उबारने में वैज्ञानिकों, अधिकारियों, चिकित्सकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ऐसी ही कुछ महिलाओं की उपलब्धियों के प्रति सम्मान प्रकट करती अमर उजाला की यह विशेष रिपोर्ट...
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस थीम : कोविड-19 से युद्ध के अग्रिम मोर्चे पर महिला वैज्ञानिक
कोविड-19 महामारी से उबरने में महिला वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने अहम योगदान दिया। इनके अथक प्रयासों से ही आज हम वायरस के बारे में जानकारी करने, जांच की तकनीक विकसित करने और उसे परास्त करने के लिए टीका तैयार करने में सक्षम हो सके। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इनके कामों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को चुना है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में समस्त स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का 38 प्रतिशत महिलाएं हैं। इनकी सबसे बड़ी संख्या नर्सों की है, हर एक मेल नर्स पर आठ फीमेल नर्स हैं। कुल संख्या 30.7 लाख आंकी जाती है, हालांकि यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय अनुपात से करीब 20 लाख कम हैं, फिर भी वह आग्रिम मोर्चे पर आ डटीं। कई हफ्ते परिवारों से दूर रहीं, ताकि उन्हें संक्रमण से बचा सकें। दूसरी अहम कड़ी चिकित्सकों की है, जिनमें महिलाएं करीब 20 प्रतिशत हैं। इसी तरह राज्यों की पुलिस में करीब 1.7 लाख महिला कर्मियों ने भी अहम भूमिका निभाई।
इसलिए अहम है महिला शक्ति का योगदान....
- 135 करोड़ की आबादी वाले देश में संक्रमितों की मृत्युदर 1.45 प्रतिशत रही, जो आंकड़ों में बहुत अधिक और दुखद, फिर भी कई विकसित देशों की तुलना में बहुत कम।
- 2400 तक पहुंचाई गई प्रयोगशालाओं की संख्या, जो शुरुआत में 10 से कम थीं।
- 12 लाख जांच प्रतिदिन तक पहुंचाया गया आंकड़ा जो शुरुआत में चंद जांचों तक सीमित था।
- 96 प्रतिशत से अधिक रिकवरी दर रही।
- 16 लाख लोगों आइसोलेट करने की व्यवस्था की गई।
- 85 हजार आईसीयू बेड, 41हजार वेंटीलेटर और 2.7 लाख ऑक्सीजनयुक्त चिकित्सा सेवाएं तैयार हुईं।
महामारी से लड़ने के लिए स्वदेशी जांच किट की आपूर्ति 90 दिन से पहले शुरू हुई
डॉ. रेणु स्वरूप, सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एंव प्रौद्योगिकी मंत्रालय
विज्ञान एंव प्रौद्योगिकी मंत्रालय में सचिव डॉ. रेणु स्वरूप बताती हैं कि देश में जब महामारी ने दस्तक दी तो हमारी सबसे पहली कोशिश शोध से जुड़े समूहों और वैज्ञानिकों को एकजुट करना था, ताकि कोविड-19 से लड़ाई की रूपरेखा तैयार की जा सके। टीम ने दिन रात एक कर जांच और इलाज से लेकर बचाव तक ब्लू प्रिंट तैयार किया। सभी की मेहनत की बदौलत कोरोना की स्वदेशी जांच किट तैयार की गई। 90 दिन के भीतर शिक्षण संस्थानों, स्टार्टअप और शोधकर्ताओं ने स्वदेशी किट की आपूर्ति शुरू कर दी। इससे सिर्फ देश की ही जरूरतें पूरी नहीं हुई, दूसरे देशों को भी मुहैया कराया गया।
महामारी के बीच मिशन स्वदेशी पर जोर
कोविड सुरक्षा मिशन के तहत देश में और टीकों के जल्द आने की उम्मीद है। डॉ. स्वरूप बताती हैं कि महामारी ने हमारी ताकत और कमजोरियों का अहसास कराया है। इसी को देखते हुए देश में लैबोरेटरी का नेटवर्क स्थापित करने पर जोर दिया गया। इसके साथ ही स्वदेशी किट की आपूर्ति के साथ और गहन अध्ययन को प्राथमिकता दी जा ही है। देश में इस तरह की महामारी से लड़ाई के लिए पर्याप्त संसाधनों का होना जरूरी है जिसमें काफी कामयाबी मिल गई है।
विज्ञान में बेटियों के लिए खूब हैं मौके
विज्ञान समाज के लिए काम करने का अवसर देता है। कोरोना महामारी ने बता दिया है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी ने किस तरह से लड़ाई को आसान किया है। आज विज्ञान के क्षेत्र में लड़कियों के आने के लिए काफी मौके हैं। विज्ञान के क्षेत्र में शोध से लेकर आंत्रप्रेन्योरशिप का काफी मौके हैं। सरकार ने भी इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के लिए कई तरह की योजनाएं लागू की हैं।
किसी को नहीं पता था क्या है सही रास्ता, न इलाज था: प्रीति सूदन
प्रीति सूदन : पूर्व सचिव, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
जनवरी 2020 में कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए संयुक्त निगरानी समूह की बैठक के साथ महामारी के खिलाफ युद्ध की शुरुआत हुई। 1983 बैच की आंध्र प्रदेश कैडर र्की आईएएस अधिकारी प्रीति सूदन की टीम को नोडल एजेंसी बनाया गया। 30 जनवरी को वुहान से लौटा एक छात्र पहले संक्रमित के रूप में पहचाना गया। इसके बाद अगले सात महीने कार्य क्षेत्र के मामले में प्रीति सूदन के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय साबित हुआ।
वे आंध्र प्रदेश में आपदा प्रबंधन आयुक्त के तौर पर प्राकृतिक आपदाओं से लेकर वायरस संक्रमण तक में काम कर चुकी थीं, लेकिन इस बार बात कुछ और थी। किसी को पुख्ता तौर पर नहीं पता था कि सही रास्ता क्या है? न कोरोना का इलाज था। जो सूचनाएं आती गईं, उनके अनुसार बचाव व सुरक्षा की गाइडलाइन जारी किया जाता। प्रीति के अनुसार पूरा अभियान समन्वय पर आधारित था, जिसके लिए डॉक्टर, नर्सेस, आशा वर्कर से लेकर पुलिस और सुरक्षाबल तक फ्रंटलाइन पर उतर चुके थे। रोजाना संक्रमण के बढ़ते मामलों की समीक्षा की, वुहान से 645 भारतीय छात्रों को भारत लाने में अहम भूमिका निभाई।सेवानिवृत के बाद सितंबर में विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक स्वतंत्र वैश्विक पैनल में शामिल की गईं।
अब आगे क्या?
प्रीति के अनुसार टीका आने के बाद महामारी से निश्चिंत होने का समय नहीं आया है। प्रकोप कम होने पर भी हमें कोई कोताही नहीं बरतनी है। हम ब्रिटेन और अमेरिका को देख ही रहे हैं, न्यूजीलैंड तक फिर से लॉकडाउन पर विचार कर रहा है। मेरा मानना है कि अब हमें अपना सामाजिक व्यवहार बदलना होगा, कोविड के अनुसार जीवन जीना होगा, अपना आवागमन और गतिविधियां सीमित करते हुए घर और परिवार में ज्यादा समय बिताना होगा।
लड़कियों को साइंस में इसलिए आना चाहिए
मेरा मानना है कि देश में कई सरकारी योजनाएं चल रही हैं, जहां महिलाओं को विज्ञान में लाने के प्रयास हो रहे हैं, इनका फायदा लेना चाहिए। वैसे भी साइंस ही नहीं, अब तो सेना में भी महिलाओं की भूमिका बढ़ रही है। लड़कियों को केवल अवसर चाहिए, इसके बाद उन्हें नये क्षेत्रों में खुद को सबित करने से कोई नहीं रोक सकेगा।
अनुमान नहीं था महामारी ऐसे फैलेगी, पहला लक्ष्य था देश में जांच सुविधा तैयार करना: डॉ. प्रिया अब्राहम
डॉ. प्रिया अब्राहम, निदेशक, राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान, पुणे
डॉ. प्रिया ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) पुणे के निदेशक पद की जिम्मेदारी कोरोना वायरस का पहला केस मिलने के करीब दो महीने पहले संभाली थी। तब उन्हें इल्म भी नहीं था कि देश को जानलेवा वायरस से बचाने में उनकी अहम भूमिका होगी। डॉ. प्रिया बताती हैं कि जब हमने इसपर काम शुरू किया था तब हमें बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि महामारी इस तरह फैलेगी। बस ये पता था कि देश को जांच की बेहतर सुविधा मुहैया कराना है। इसी का नतीजा रहा कि देश में आज बड़े पैमाने पर कोरोना की जांच हो रही है और स्थिति नियंत्रण में है।
नए स्ट्रेन को लेकर पहले से तैयारी
डॉ. प्रिया बताती हैं कि महामारी से निपटने के लिए काम लगातार जारी है। तीन और कंपनियां चाहती हैं कि हम उनके टीके के फॉर्मुलेशन की जांच करें। इसके अलावा एनआईवी की टीम कुछ कंपाउंड को लेकर एंटी-वायरल टेस्टिंग पर काम कर रही है जिससे ये पता चलेगा कि ये कंपाउंड वायरस को मारने में सक्षम है या नहीं। कोरोना के नए स्ट्रेन को लेकर भी टीम सतर्क हो गई है और आगे की रणनीति पर तेजी के साथ काम चल रहा है।
वायरोलॉजी बेहद रोचक क्षेत्र है
च्मुझे लगता है कि युवा लड़कियों के लिए वायरोलॉजी एक रोचक क्षेत्र है। यहां आप कभी ऊबेंगे नहीं, लेकिन सफल होने केलिए आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। लड़कियों से मैं यही कहूंगी की आपकी मेहनत हमेशा किसी न किसी के काम आएगी जिसको देख और महसूस कर आपको बहुत अच्छा लगेगा। एनआईवी में बहुत वैज्ञानिक और स्टाफ महिला हैं। मुझे गर्व है कि सभी ने अपना योगदान दिया और उसी की बदौलत महामारी से लड़ाई में हम कामयाब हुए हैं।
डॉ. प्रज्ञा ध्रुव यादव : महिला का योगदान समाज के साथ बाकी महिलाओं का जीवन भी सुधारता है
परिचय : वैज्ञानिक ई व आईसीएमआर के राष्ट्रीय विषाणुविज्ञान संस्थान की बायोसेफ्टी लेवल - 4 प्रयोगशाला की प्रमुख
कोविड-19 के प्रबंधन से जुड़ा घटनाक्रम और योगदान
पिछले 20 वर्ष से एशिया के स्टेट ऑफ द आर्ट संस्थान में जन स्वास्थ्य से लिए काम करते हुए प्रज्ञा को वायरस से होने वाली बीमारियों, उनकी जांच और खतरों को समझने में विशेषज्ञता मिल चुकी थी। महामारी फैली तो पहला काम संदिग्ध लोगों के सैंपलों की जांच की तकनीक विकसित करना था ताकि पता चले कि कौनसे यात्री वायरस लेकर आ रहे हैं? पुणे में प्रज्ञा और उनकी टीम को वायरस को सैंपल से अलग करने में सफलता मिली। इसमें आरटीपीसीआर की मदद ली गई।
प्रज्ञा ने इसी दौरान ईरान के तेहरान में भारतीयों के लिए जांच केंद्र व प्रयोगशालाएं विकसित करने के लिए काम किया। इनके सैंपल भी एनआईवी पुणे भेजे गए। अब बारी थी कम से कम समय में टीका तैयार करने की, जिसे भारत बायोटेक इंडिया लिमिटेड के साथ बिना अंतरराष्ट्रीय मदद के तैयार किया गया। प्रज्ञा का एक और महत्वपूर्ण योगदान कोविड महामारी के दौरान देश को विज्ञान शोध में आगे बढ़ाना था। उन्होंने अब तक 40 शोध पेपर लिखे हैं जो लेंसेट इंफेक्शियस डिजीज, बीएमजे, आई-साइंस, नेचर-इटी आदि में प्रकाशित हुए।
अब आगे क्या ?
टीका आने के बाद भी चुनौतियां बाकी हैं, कोरोना वायरस का नया स्ट्रेन सबसे बड़ा खतरा है। प्रज्ञा मानती हैं कि यह टीकाकरण अभियान को भी प्रभावित कर सकता है। उनकी टीम ने हाल ही में इंग्लैंड से लौटे संक्रमित में यह नया स्ट्रेन पता लगाया गया है। वे कहती हैं कि नए स्ट्रेन के संक्रमितों से बाकी आबादी में इसे फैलने से रोकना होगा।
विज्ञान उत्साह जगाता है, इसकी बारीकियां समझें
च्किशोरों के मन में विज्ञान उत्साह जगाता है। जो लड़कियां इस क्षेत्र को अपनाना चाहती हैं उन्हें मेरा संदेश है कि वे बारीकियों को समझने के लिए अपने दिमाग को लगाएं। साथ ही जानकारी बढ़ाएं, संवाद करना सीखें और चीजों के काम करने की तकनीकी प्रक्रिया को समझें। विज्ञान में महिलाओं द्वारा किया जाने वाला योगदान समाज के साथ खुद महिलाआें केे जीवन को सुधारने में उपयोगी होगा। हमारा देश बदल रहा है, खुद को मजबूत कर रहा है, यह युवा लड़कियों के लिए अच्छा मौका है कि वे विज्ञान क्षेत्र में आगे बढ़ें और अपनी प्रतिभा दर्शाएं।
जांच लैब तैयार करने के लिए सात महीने बिना छुट्टी के काम: डॉ. निवेदिता गुप्ता
डॉ. निवेदिता गुप्ता, वैज्ञानिक, वायरोलॉजी यूनिट, आईसीएमआर, दिल्ली
देश में कोरोना महामारी ने अपना दायरा बढ़ाना शुरू किया तो इसके भयावह रूप का आकलन कर दिन-रात एक कर इससे लड़ने की ठान ली थी। कोरोना को हराना तभी संभव था जब देशभर में जांच की सुविधा पर्याप्त मात्रा में हो। जांच पर जोर देने के लिए सरकार से संदेश मिला। इसके बाद निवेदिता और उनकी टीम ने 28 जनवरी 2020 से लगातार सात महीने तक बिना छुट्टी के काम किया। नतीजा ये रहा कि महामारी की शुरुआत में कोरोना जांच की एक लैब थी जो अब 2400 हो गई है। डॉ. निवेदिता और उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती लैब में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा थी। इसके लिए डॉ. निवेदिता और उनकी टीम ने देशभर में कोरोना जांच में लगे लैब कर्मियों को ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया ताकि वे सुरक्षित रहें।
जांच के लिए स्वदेशी किट पर जोर
डॉ. निवेदिता बताती हैं कि देश में मार्च तक कोरोना जांच का आधा सामान बाहर से आता था। स्वदेशी जांच किट के लिए कंपनियों से बात की और प्रोटोकॉल तैयार कर उसका इस्तेमाल शुरू किया। इसी के साथ भारत दुनिया का पहला देश बना जहां रैपिड एंटीजन टेस्ट को मान्यता मिली। पूलिंग सैंपल के तहत भी जांच को अंजाम दिया गया। आज देश में 500 से 600 तरह की किट है जिससे कोरोना जांच सस्ती दर पर हो रही है।
भविष्य की भी तैयारी की
महामारी के खिलाफ काम करने के साथ भविष्य में ऐसी स्थिति से निपटने की भी तैयारी की। जून 2020 में देश के 536 मेडिकल कॉलेजों में मॉलीक्यूलर वायरोलॉजी लैब का होना अनिवार्य किया गया। अब तक 526 मेडिकल कॉलेजों में ये लैब शुरू भी हो चुकी है। ये लैब आज भी मदद कर रही हैं और भविष्य में भी करेंगी।
पिता के मार्गदर्शन ने यहां तक पहुंचाया
डॉ. निवेदिता ने एमबीबीएस की पढ़ाई दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से की है। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से मॉलीक्यूलर मेडिसिन में पीएचडी है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और यूनिवर्सिटी ऑफ जिनेवा से वीक्सीनोलॉजी में विशेषज्ञता हासिल की है। 2005 से आईसीएमआर के साथ काम कर रही हैं। इनके पिता डॉ. सीएम गुप्ता और मां सविता गुप्ता इनके प्रेरणास्रोत हैं। पिता सीडीआरआई लखनऊ के निदेशक रहे हैं।
विज्ञान में बेटियों के ज्ञान की जरूरत
च्लड़कियों को विज्ञान की दुनिया में आने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए, विज्ञान को भी उनके ज्ञान और सोचने की विविधता भरे तरीके की जरूरत है। यह लड़कियां देश को भविष्य में इस तरह की महामारी से बचाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। मैं सभी युवाओं और लड़कियों से कहूंगी कि आप विज्ञान की दुनिया में आएं। यहां आपको बेहतर काम और खुद को दुनिया के सामने साबित करने का बेहतर मौका मिलेगा।
महामारी में भी आम लोगों और नेतृत्वकर्ताओं की मेहनत व त्याग ने प्रेरित किया: पौमी बरुआ
परिचय : कोविड-19 महामारी के दौरान ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग असम।
अप्रैल 2020 में महामारी के लॉकडाउन के बीच राजस्थान के कोटा से करीब 400 विद्यार्थी 17 बसों में पांच राज्यों को पार करते हुए अपने घर असम लौटे तो इसमें राज्य की की डिप्टी सेक्रेट्री पौमी बरुआ की मेहनत भी शामिल थी। उन्हें प्रदेश का नोडल अधिकारी बनाया गया, जहां से उन्होंने हेल्पलाइन 104 के जरिए कोविड-19 संक्रमितों की कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग शुरू करवाई।
यही नहीं उन्होंने हेल्पलाइन को लोगों तक सभी तरह की मदद पहुंचाने का जरिया भी बनाया, जिसमें दवा से लेकर खाना तक शामिल था। वहीं गंभीर रोगियों के लिए सितंबर 2020 में एनएचएम की ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बन चुकी पौमी बरुआ के नेतृत्व में प्लाज्मा डोनेशन का अभियान शुरू किया गया। वे बताती हैं कि शुरुआती समय में कोविड-19 महामारी किसी के नियंत्रण में आती नहीं दिख रही थी। पूरी दुनिया में हजारों लोगों के मरने की खबरें और बिगड़ते हालात चिंता में डाल रहे थे। यह सब मुझे गहरे तक प्रभावित लेकिन प्रेरित कर रहा था। मुझे मिले काम को अपने सर्वश्रेष्ठ तरीके से करना चाहती थी, पौमी ने बताया।
मार्च में उन्हें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के साथ काम करने का अवसर मिला, पहला काम असम को बढ़ रहे संकट से लड़ने के लिए तैयार करना था। पौमी इसे अपने जीवन का टर्निंग पॉइंट बताते हुए कहती हैं कि उन्हें इस संकट ने कई अनुभव दिए। एक ओर लोग दुखी थे, अपनों की मृत्यु और हताशा जैसे कष्ट भोग रहे थे तो दूसरी ओर समाज के हर वर्ग के नागरिक और नेतृत्वकर्ता अपनी मेहनत, निस्वार्थ कामों और त्याग से सेवा जुटे हुए थे। यह मानवता में उम्मीद जगाने के लिए काफी था। वे खुद भी इस दौरान जब कई काफी समय तक घर से दूर रहतीं, परिवार का ही सहयोग उनका सहारा बनता।
अब आगे क्या
पौमी के अनुसार अब उनका और उनकी टीम का लक्ष्य टीकाकरण में बड़ी संख्या में नागरिकों को समय पर शामिल करना है। लोगों तक सही जानकारियां पहुंचेंगी तो वायरस और टीकाकरण के बारे में कई अज्ञात डर दूर होंगे।
लड़कियां अपने लक्ष्य बनाएं, उन्हें हरगिज न छोड़ें
च्मैं लड़कियों के लिए संदेश देना चाहूंगी कि अपने लक्ष्य निर्धारित करें और चाहे जो हो, उसे हरगिज न छोड़ें। जीवन लक्ष्य के बिना कुछ नहीं है, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि चाहे जितनी ऊंचाई हासिल करें, अपनी जड़ों को न भूलें। जिन्हें मदद चाहिए, उनकी मदद करने का जज्बा रखें, समाज के लिए हर संभव तरीके से योगदान की कोशिश करें।
इनके बिना अधूरी रहती कोरोना संघर्ष शक्ति: केके शैलजा
केके शैलेजा : मृत्युदर कम रखकर बचाए 10 हजार जीवन
दूसरी सर्वाधिक संक्रमण संख्या के बावजूद मृतकों के मामले में केरल देश में नौंवा राज्य है। इसकी कई वजहों में से एक यहां की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा और उनकी कोरोना ब्रिगेड टीम को माना जा रहा है। उनकी उपलब्धि को ऐसे समझें कि यहांदेश की 1.45 प्रतिशत कोविड-19 मृत्युदर केरल में भी रहती तो यहां 28 फरवरी 2021 तक 4,197 के बजाय 14,579 नागरिक मारे जाते।
64 साल की शैलजा के सामने प्रवासी श्रमिकों के लौटने पर वायरस फैलने की आशंका से लेकर वृद्ध जनों में संक्रमण से होने वाली जटिलताओं से जूझने की चुनौती थी। उन्होंने करीब 90 लाख श्रमिकों को डेढ़ हजार सामुदायिक रसोइघरों से खाना मुहैया करवाने, लाखों परिवारों को भोजन मुहैया करवाने, राज्य में लौटे श्रमिकों को क्वारंटीन रखने, जांच और देखभाल की व्यवस्थाएं विकसित कीं।
परिणाम यह रहा कि मई में जहां देश में संक्रमित हुए 1.5 प्रतिशत लोगों की मौत हो रही थी, केरल में आंकड़ा 0.8 प्रतिशत यानी करीब आधा था। उनके काम व अनुभवों का फायदा लेने के लिए अब तक कई अंतरराष्ट्रीय संगठन उन्हें अपनी समितियों का हिस्सा बना चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सम्मान और देशी-विदेशी प्रेस द्वारा च्कोरोना स्लेयरज् व च्रॉकस्टार हैल्थ मिनिस्टरज् आदि उपाधियां दी गईं।
डॉ. बीला राजेश : डॉक्टर आईएएस ने समझी जमीनी स्थिति
तमिलनाडु की स्वास्थ्य सचिव के तौर पर डॉ. बीला राजेश के काम को देश भर में पहचाना गया। 1997 बैच की आईएएस ऑफिसर होने के अलावा वे एक डॉक्टर भी हैं। महामारी के दौरान उनके नेतृत्व में राज्य ने स्वास्थ्य सिस्टम तैयार किया जिसमें कोविड संक्रमितों की कड़ी निगरानी की गई। मीडिया ब्रीफिंग, कंटेनमेंट जोन के दौरे, बचाव के उपायों को लागू करने के साथ साथ उन्होंने सोशल मीडिया को भी जागरुकता बढ़ाने का जरिया बनाया। उनके द्वारा लोगों से की गई सीधी अपील भी अहम रही, जिसके बाद लोगों संक्रमण की संभावना होने पर खुद आकर अपनी जांच करवानी शुरू की।
दुनियाभर के वैज्ञानिकों का प्लेटफॉर्म तैयार किया
डॉ. सौम्या स्वामीनाथन, मुख्य वैज्ञानिक, डब्ल्यूएचओ
विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन का अधिकतर काम चिकित्सकीय अध्ययनों के आधार पर इलाज के बेहतर मॉडल विकसित करना रहा है। 30 वर्ष का अनुभव रखने वाली डॉ. सौम्या ने कोविड-19 से जुड़े तथ्यों और नई जानकारियों को प्रामाणिक ढंग से सामने रखा। साथ ही गलत धारणाओं व सूचनाओं को रोकने के लिए भी काम किया। सबसे अहम रही कोरोना वायरस की संपूर्ण जीनोम सीक्वेंसिंग। इसके लिए डॉ. स्वामीनाथन ने पूरे विश्व के वैज्ञानिकों को साथ काम करने के लिए प्लेटफॉर्म तैयार किया, डाटा साझा किया जाने लगा। इसका उपयोग वायरस के नए व बदलते स्ट्रेन को समय पर पहचानने और टीका तैयार करने में हो सका।
बेटियों को दृढ़तापूर्वक रखनी होगी अपनी बात
बेटियों को संदेश देते हुए डॉ सौम्या कहती हैं कि, भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में महिलाओं को कॅरिअर में आगे बढ़ने के दौरान शुरुआती परेशानी आती है। महिलाओं को अपनी बात दृढ़तापूर्वक रखनी होगी। समय के साथ हमारी बेटियां अधिक रचनात्मक, परिपक्व और आक्रमक हुई हैं।