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तुमसे है उजाला: हजारों-लाखों जरूरतमंद बेटियों का संवारा जीवन, जानिए लखनऊ की नंदिनी मिश्रा की कहानी

Wed, 28 May 2025 07:01 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

Inspiring Story Of Nandini Mishra: आज नंदिनी और उनकी संस्था तकरीबन डेढ़ लाख महिलाओं और 50 हजार बेटियों का जीवन बदल चुकी है। वह महिलाओं को कई कलाओं में प्रशिक्षित करती हैं, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। साथ ही उन्होंने कई ग्रामीण महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से भी बाहर निकला।
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नंदिनी मिश्रा - फोटो : nandinimishra
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विस्तार
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Inspiring Story Of Nandini Mishra: उत्तर प्रदेश के लखनऊ की रहने वाली नंदिनी मिश्रा हजारों महिलाओं की बेटी-बहन तो हजारों बेटियों की मां हैं। नंदिनी कहती हैं, उनका सबसे बड़ा पुरस्कार किसी ऐसी महिला को मुस्कुराते हुए देखना है, जो कभी घूंघट में थी और आज आत्मविश्वास से जी रही है।

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आईएएस पिता रामाकांत मिश्रा के जीवन अनुभव बचपन में ही नंदिनी के मन-मस्तिष्क में घर कर गए। वह बचपन से ही एक ख्वाब देखने लगीं। ख्वाब था, जरूरतमंदों और हाशिए पर खड़ी महिलाओं को सशक्त बनाना। नंदिनी ने अर्थशास्त्र में पढ़ाई पूरी की और 1997 में उनकी बैंकर बिभूति कुमार से शादी हो गई। शादी के बाद नंदिनी ने अपने इस ख्वाब के बारे में पति को बताया। पति ने नंदिनी को शादी का पहला उपहार उनकी सोची गई संस्था ‘महिला प्रबोधिनी’ को रजिस्टर करवाकर दिया। पति का साथ पाकर नंदिनी ने समाज के हाशिए पर पड़े लोगों, विशेषकर दलित और वंचित महिलाओं के साथ खड़े होने का संकल्प लिया।

नंदिनी का सपना

नंदिनी बताती हैं, “आज से करीब 25 साल पहले मेरे पास एक सुरक्षित करियर और आरामदायक जीवन का विकल्प था, लेकिन मन में कमजोर, पीड़ित और केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से पीड़ित महिलाओं का हाथ थाम कर उन्हें सशक्त बनाने की चाह थी। इसलिए संस्था के रजिस्टर होने के तीन साल बाद यानी साल 2000 में मैं पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर गई।”
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महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कर रही काम

नंदिनी की यह पहल किसी कॉर्पोरेट ऑफिस या वातानुकूलित मीटिंग रूम से नहीं, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र, जौनपुर और प्रयागराज जैसे जिलों की धूल भरी गलियों से शुरू हुई। ये उत्तर प्रदेश के ऐसे इलाके थे, जहां कई महिलाएं न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक और मानसिक रूप से भी कई बंधनों में जकड़ी हुई थीं। इन्हीं महिलाओं के जीवन को बदलने का संकल्प लिए नंदिनी ने विधवा, अकेली मां और वे लड़कियां, जो स्कूल छोड़ने की कगार पर थी, उन का हाथ थाम लिया। नंदिनी ने इन महिलाओं को उनकी गरिमा लौटाने के लिए आजीविका के साधन उपलब्ध कराने शुरू किए। उन्होंने महिलाओं को सिखाया कि वे सिर्फ कामगार नहीं, समाज का नेतृत्व करने वाली इकाइयां भी बन सकती हैं। हालांकि नंदिनी के लिए यह काम आसान नहीं था।

वह बताती है, “चूंकि मैं उच्च वर्ग से हूं, इसलिए मायके तथा ससुराल पक्ष ने मेरे काम का विरोध किया, तो विदेश में रह रहीं मेरी दोस्तों ने भी मुझसे सवाल किया कि मैं इतनी अच्छी जिंदगी छोड़कर क्यों गांव-गांव, बस्ती-बस्ती घूम रही हूं। मैंने उन्हें बस एक उत्तर दिया, मैं जो करना चाहती थी, आज मैं वही कर रही हूं।

डेढ़ लाख महिलाओं का बदला जीवन

आज नंदिनी और उनकी संस्था तकरीबन डेढ़ लाख महिलाओं और 50 हजार बेटियों का जीवन बदल चुकी है। वह महिलाओं को कई कलाओं में प्रशिक्षित करती हैं, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। साथ ही उन्होंने कई ग्रामीण महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से भी बाहर निकला। आज ये महिलाएं न केवल आत्मनिर्भर हैं और आत्मविश्वास से भरपूर हैं, तो कई अब शिक्षित हैं और दफ्तरों में नौकरी कर रही हैं या अपना व्यवसाय चला रही हैं।

25 सालों से कर रही समाज सेवा

25 सालों में किसी की मां, किसी की बेटी तो किसी की बहन बनीं नंदिनी मिश्रा एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ संस्थागत नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका में भी हैं। वह पीओएसएच (कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम) समिति की क्षेत्रीय अध्यक्ष हैं और दहेज निषेध बोर्ड की सक्रिय सदस्य हैं। इन भूमिकाओं के माध्यम से वह लगातार महिलाओं के लिए सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में योगदान कर रही हैं। उनकी असाधारण भूमिका के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार सराहा गया। हालांकि नंदिनी कहती हैं कि उनका सबसे बड़ा पुरस्कार एक ऐसी महिला को मुस्कुराते हुए देखना है, जो कभी घूंघट में थी और आज आत्मविश्वास से जी रही है, अपनी बेटी को स्कूल भेज रही है और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रही है।

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