केवल भारत ही नहीं बल्कि अफ्रीका जैसे देशों में इस आपूर्ति में बाधा पहुंची है। अप्रैल में कराए गए सर्वे में ये बात सामने आई है। डिस्पोसेबल पैड करीब 23 संगठनों के द्वारा बांटे जाते हैं। जिसको करीब 59 प्रतिशत महिलाएं इस्तेमाल करती हैं। सैनेटरी पैड्स की आपूर्ति में बाधा का अर्थ है कि बहुत सी महिलाएं और लड़कियां इस समय स्वच्छता की कमी की वजह से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से परेशान हो सकती हैं। इसका कारण है माहवारी के समय कपड़े का इस्तेमाल। गांवों में और कम आमदनी वाले घरों की लड़कियां सरकारी स्कूलों में मिलने वाले सैनेटरी पैड्स पर निर्भर रहती हैं। लेकिन लॉकडाउन में विद्यालयों के बंद होने के कारण उन्होंने कपड़े के पैड इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
MHAI के सर्वे में पता चला है कि केवल 25 प्रतिशत इकाईयां ही चल रही हैं और 50 प्रतिशत इकाईयां आधा उत्पादन कर रही हैं। जिसका कारण है पिछले तीन महीनों में कच्चे माल की आपूर्ति का बंद होना। केवल 24 प्रतिशत इकाईयों के पास मांग के अनुसार आपूर्ति का माल है। परिवहन की रोक और सड़कों के बंद होने के साथ ही नए उत्पादन के नियम भी इसका कारण हैं। वहीं मजदूरों के पलायन के साथ ही डिस्पोजेबल सैनेटरी पैड बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में लकड़ी के गूदे की आपूर्ति बड़ी चुनौतीपूर्ण है।