फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Women's Day: 28 फीसदी महिलाओं को ही खुद के फैसले लेने की आजादी, करियर बनाने के लिए पति से लेनी होती है इजाजत

सार

शादी के बाद महिलाएं अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खो देती हैं। इसके अलावा उनकी प्राइवेसी में भी पति व ससुराल का हस्तक्षेप बढ़ जाता है। भविष्य की योजनाएं उनकी खुद की इच्छाओं पर नहीं बल्कि साथी की अनुमति के दायरे में आ जाती है। इस विषय में विस्तार से जानिए।
विज्ञापन
शादी के बाद महिलाएं अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खो देती हैं। - फोटो : iStock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

International Women's Day 2025: विवाह दो लोगों के बीच का रिश्ता है, जिनके बीच कोई एक बड़ा या छोटा नहीं होता, बल्कि दोनों एक दूसरे के पूरक और समान होते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गृहस्थ जीवन जीने वाले भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का अर्धनारीश्वर स्वरूप है। ⁠हालांकि भारतीय समाज में शादी के बाद एक पत्नी का जीवन पति और ससुराल के अधीन होता है।

विज्ञापन


2021 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, केवल 28 फीसदी महिलाएं अपने लिए स्वतंत्र रूप से चयन कर सकती हैं जबकि 79 प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि उन्हें करियर को प्राथमिकता देने के लिए अपने साथी की अनुमति की आवश्यकता होती है। मनोवैज्ञानिक वंदना सिंह बताती हैं, समान भागीदारी स्थापित करना अभी भी सामान्य नहीं हुआ है। जोड़े अपने साथी की राय लेते हैं लेकिन महिलाओं को पुरुषों के प्रति आभारी महसूस कराया जाता है कि वे उन्हें अपनी पसंद अपनाने की अनुमति दे रहे हैं।"

शादी के बाद महिलाएं अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खो देती हैं। इसके अलावा उनकी प्राइवेसी में भी पति व ससुराल का हस्तक्षेप बढ़ जाता है। भविष्य की योजनाएं उनकी खुद की इच्छाओं पर नहीं बल्कि साथी की अनुमति के दायरे में आ जाती है। इस विषय में विस्तार से जानिए।
विज्ञापन


आर्थिक स्वतंत्रता 

आमतौर पर महिलाएं शादी के बाद वित्तीय स्वतंत्रता खो देती हैं। इसका कारण है कि परिवार संभालने के लिए उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ जाती है। इसके अलावा वह अपनी संपत्ति, कमाई या वित्तीय प्रबंधन पति पर छोड़ देती हैं। 







कैसे पाएं वित्तीय स्वतंत्रता  

एक आईटी पेशेवर के मुताबिक, उनका एक व्यक्तिगत बैंक खाता है। हर महीने अपने वेतन का 20 फीसदी हिस्सा वह व्यक्तिगत खर्चों और भोग-विलास के लिए अपने व्यक्तिगत अकाउंट में ट्रांसफर करती हैं। एक गृहणी फाइनेंस की क्लासेज लेती हैं ताकि ये समझ सकें कि पति उनकी बचत का निवेश कैसे कर रहे हैं। इसके अलावा एक आईटी विशेषज्ञ महिला ने अपने नाम पर फ्लैट खरीदने के लिए ऋण खाता खोला है क्योंकि रूढ़िवादी परिवारों में महिलाओं को विरासत में कुछ नहीं मिलता है। 

निजता या गोपनीयता

हर महिला को कुछ हद तक प्राइवेसी की आवश्यकता होती है, चाहे वह शादी के बाद संयुक्त परिवार में रहती हो या एकल परिवार में। अधिकतर महिलाएं शादी के बाद अपने फोन के पासवर्ड से लेकर एटीएम पिन तक को पति से शेयर करती हैं। हालांकि महिलाओं को स्वतंत्रता के लिए इतनी प्राइवेसी बनाकर रखनी चाहिए।

एक मीडिया पेशेवर के मुताबिक वह अपने पति के साथ अपना पासवर्ड साझा नहीं करती हैं। वह नहीं चाहती कि फोन के माध्यम से उनकी निजी बातचीज पति को पता चले और न ही उनके खातों में पैसों की जानकारी पति को मिले।

प्राइवेसी सिर्फ जानकारी तक नहीं बल्कि जीवन में भी होनी चाहिए। महिलाओं को चाहिए कि वह खुद के लिए समय निकालें। इस वक्त पति, ससुराल या बच्चों की जिम्मेदारी उनकी न होकर परिवार में किसी अन्य सदस्य या उनके जीवनसाथी को हो। ये वक्त सुबह के एक दो घंटे का हो सकता है या शाम व रात का। इस दौरान वह ध्यान लगा सकती हैं। बालकनी में बैठकर चाय पी सकती हैं। सेल्फ केयर से जुड़ी चीजों में व्यस्त हो सकती हैं या अपनी सहेलियों के साथ शाॅपिंग पर जा सकती हैं। ये हर दिन का नियम होना चाहिए कि पूरे दिन के दो घंटे आपकी निजी जीवन के लिए हों।

Trending Videos
विज्ञापन

बच्चे की देखभाल महिलाओं की जिम्मेदारी - फोटो : Pexel
बच्चे की देखभाल

बच्चे की देखभाल में माता और पिता दोनों की ही भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन महिलाएं को अक्सर बड़े फैसलों से दूर रखा जाता है। एक 34 वर्षीय नौकरीपेशा महिला बताती हैं, "मैंने और मेरे पति ने तय किया कि मैं अपने बेटे का नाम रखूंगी। ससुराल के लोग इससे असहमत थे। हालांकि मैंने जाकर बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र पर अपनी पसंद का नाम दर्ज करवाया, फिर वे कुछ नहीं कर सके।"

वहीं एक स्त्री ने अंतरधार्मिक विवाह किया था। शादी के बाद उन्हें पति के धर्म को अपनाने के लिए मजबूक किया गया लेकिन महिला अपने ससुराल वालों की जानकारी के बिना बच्चों की परवरिश दोनों धर्मों को ध्यान में रखकर कर रही हैं। एक और महिला हैं जो अपनी बेटू को पढ़ाने के लिए घर खर्च से पैसों की बचत करती हैं, क्योंकि उनके ससुराल वालों को लगता है कि लड़कियों को कॉलेज जाने की जरूरत नहीं होती है। 

वहीं एक नौकरीपेशा महिला पर बच्चे के जन्म के बाद उसकी देखभाल के लिए नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है। हालांकि महिला ने इससे इनकार करते हुए बच्चे को अपने माता-पिता के पास छोड़ दिया और देखभाल के लिए एक नैनी भी रख ली।

माता-पिता का सहयोग

किसी भी लड़की के लिए शादी के बाद अपने माता-पिता की देखरेख या सहयोग करना अक्सर ससुराल में विवाद का कारण बन जाता है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वह शारीरिक और वित्तीय हर तरह से अपने ससुराल पर ही समर्पित हो। जब वह ऐसा करने से मना कर देती हैं तो अक्सर पति या ससुराल वालों की नाराजगी का सामना करना पड़ जाता है। इकलौती संतान होने के कारण बैंक में नौकरी करने वाली महिला ने अपने सेवानिवृत्त माता-पिता की मदद के लिए आपातकालीन निधि रखी है। वहीं एक महिला हर दूसरे महीने में अपने वृद्ध माता-पिता से मिलने जाती हैं और उन कामों में मदद करती हैं, जिसमें अधिक भागदौड़ करनी पड़ती है। हालांकि उनके पति को ये मंजूर नहीं हैं।

परिवार नियोजन

परिवार को कब बढ़ाना है और कितना बढ़ाना है, ये फैसला भी आमतौर पर पति व ससुराल के दबाव पर निर्भर करता है। इसके अलावा अगर उन्हें बच्चा नहीं चाहिए तो भी महिलाओं को ही अपने गर्भाशय पर नियंत्रण रखने के तरीके खोजने पड़ते हैं।एक बच्चे के जन्म के बाद ससुराल वाले महिला से दूसरे बच्चे की उम्मीद करते हैं, जबकि महिला और उनके पति दूसरा बच्चा नहीं चाहते हैं। ऐसे में महिला ने आईयूडी लगवा लिया। वहीं एक कपल दूसरे बच्चे की चाह तो रखता है लेकिन महिला का शरीर इसके लिए तैयार नहीं है। डाॅक्टर की अनुमति न मिलने तक महिला को ही गर्मनिरोधक का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। 

ऐसे कई और कारक हैं, जहां महिलाओं को ही पति और ससुराल की इच्छाओं के दबाव को झेलना होता है। पारिवारिक जीवन से लेकर वित्तीय या करियर में उन्हें पति की हामी पर निर्भर रहना पड़ता है। जब बलिदान की बारी आती है तो भी महिलाओ से ही अपेक्षा की जाती है कि वह आगे आएं। फिर चाहे बच्चे और परिवार को संभालने के लिए करियर का त्याग करना हो या परिवार नियोजन के लिए गर्भनिरोधक और आईयूडी लगवाना हो।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें