2021 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, केवल 28 फीसदी महिलाएं अपने लिए स्वतंत्र रूप से चयन कर सकती हैं जबकि 79 प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि उन्हें करियर को प्राथमिकता देने के लिए अपने साथी की अनुमति की आवश्यकता होती है। मनोवैज्ञानिक वंदना सिंह बताती हैं, समान भागीदारी स्थापित करना अभी भी सामान्य नहीं हुआ है। जोड़े अपने साथी की राय लेते हैं लेकिन महिलाओं को पुरुषों के प्रति आभारी महसूस कराया जाता है कि वे उन्हें अपनी पसंद अपनाने की अनुमति दे रहे हैं।"
शादी के बाद महिलाएं अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खो देती हैं। इसके अलावा उनकी प्राइवेसी में भी पति व ससुराल का हस्तक्षेप बढ़ जाता है। भविष्य की योजनाएं उनकी खुद की इच्छाओं पर नहीं बल्कि साथी की अनुमति के दायरे में आ जाती है। इस विषय में विस्तार से जानिए।
आर्थिक स्वतंत्रता
आमतौर पर महिलाएं शादी के बाद वित्तीय स्वतंत्रता खो देती हैं। इसका कारण है कि परिवार संभालने के लिए उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ जाती है। इसके अलावा वह अपनी संपत्ति, कमाई या वित्तीय प्रबंधन पति पर छोड़ देती हैं।
कैसे पाएं वित्तीय स्वतंत्रता
एक आईटी पेशेवर के मुताबिक, उनका एक व्यक्तिगत बैंक खाता है। हर महीने अपने वेतन का 20 फीसदी हिस्सा वह व्यक्तिगत खर्चों और भोग-विलास के लिए अपने व्यक्तिगत अकाउंट में ट्रांसफर करती हैं। एक गृहणी फाइनेंस की क्लासेज लेती हैं ताकि ये समझ सकें कि पति उनकी बचत का निवेश कैसे कर रहे हैं। इसके अलावा एक आईटी विशेषज्ञ महिला ने अपने नाम पर फ्लैट खरीदने के लिए ऋण खाता खोला है क्योंकि रूढ़िवादी परिवारों में महिलाओं को विरासत में कुछ नहीं मिलता है।
निजता या गोपनीयता
हर महिला को कुछ हद तक प्राइवेसी की आवश्यकता होती है, चाहे वह शादी के बाद संयुक्त परिवार में रहती हो या एकल परिवार में। अधिकतर महिलाएं शादी के बाद अपने फोन के पासवर्ड से लेकर एटीएम पिन तक को पति से शेयर करती हैं। हालांकि महिलाओं को स्वतंत्रता के लिए इतनी प्राइवेसी बनाकर रखनी चाहिए।
एक मीडिया पेशेवर के मुताबिक वह अपने पति के साथ अपना पासवर्ड साझा नहीं करती हैं। वह नहीं चाहती कि फोन के माध्यम से उनकी निजी बातचीज पति को पता चले और न ही उनके खातों में पैसों की जानकारी पति को मिले।
प्राइवेसी सिर्फ जानकारी तक नहीं बल्कि जीवन में भी होनी चाहिए। महिलाओं को चाहिए कि वह खुद के लिए समय निकालें। इस वक्त पति, ससुराल या बच्चों की जिम्मेदारी उनकी न होकर परिवार में किसी अन्य सदस्य या उनके जीवनसाथी को हो। ये वक्त सुबह के एक दो घंटे का हो सकता है या शाम व रात का। इस दौरान वह ध्यान लगा सकती हैं। बालकनी में बैठकर चाय पी सकती हैं। सेल्फ केयर से जुड़ी चीजों में व्यस्त हो सकती हैं या अपनी सहेलियों के साथ शाॅपिंग पर जा सकती हैं। ये हर दिन का नियम होना चाहिए कि पूरे दिन के दो घंटे आपकी निजी जीवन के लिए हों।