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तुमसे है उजाला: हौसले के शिखर पर डटकर खड़ी जागृति वर्मा की कहानी, उन्हीं की जुबानी

Fri, 18 Apr 2025 06:07 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

बार-बार अबॉर्शन, ब्रेस्ट कैंसर, हर्निया और गॉल ब्लैडर में स्टोन! तब जागृति को लगता था कि उनके शरीर के रूप में बीमारियों को एक स्थायी पता मिल गया है। 
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जागृति वर्मा - फोटो : Amar ujala
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विस्तार
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अक्सर शिथिल हो जाती हैं शिराएं। कैंसर के कारण सिहर जाती हैं अंदर तक। फिर भी चेहरे पर रहती है मुस्कान। अपनी उम्र के साल को शायद ही कभी गिना हो, लेकिन दूसरे कैंसर रोगियों को विश्वास दिला ही देती हैं कि बड़ी लंबी उम्र है आपकी। हौसले के शिखर पर डटकर खड़ी हैं और नाम है जागृति वर्मा।
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जागृति वर्मा की जिंदगी में एक जंग बरसों से जारी है। एक तरफ बीमारियां हैं और दूसरी तरफ लोगों की मदद करने का जुनून। जन्म उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ। पिता जी श्यामलाल वर्मा की बिजली विभाग में सरकारी नौकरी थी, इसलिए उनके ट्रांसफर की वजह से जागृति के बचपन में ढेर सारे शहर आए। कभी उनका परिवार गोंडा में होता, कभी बलरामपुर, कभी बहराइच तो कभी गोरखपुर, लेकिन उनका सबसे ज्यादा समय मिर्जापुर में बीता। वहीं वर्ष 1978 में शादी भी हुई और फिर अपने पति सुबोध चंद्र वर्मा के साथ गोरखपुर आ गईं। महात्मा गांधी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में भौतिक विज्ञान के विभागाध्यक्ष सुबोध चंद्र वर्मा ने जागृति को कुछ नया करने से न कभी रोका, न टोका।

जागृति बताती हैं, “मैंने हिंदी से एमए किया, गायन का कोर्स किया, सितार सीखा, पर्सनल ग्रूमिंग कोर्स किया तो डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाना भी सीखा। जीवन में मैंने बहुत कुछ सीखा।”
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लेकिन जिंदगी तो कुछ और चाहती थी। शादी के बाद लगातार आठ बार अबॉर्शन का सामना किया। इस सदमे से लड़ ही रही थीं कि 2004 में 41 वर्ष की आयु में उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। ऐसा लगा, मानो जिंदगी एक तीखी ढलान पर फिसलती जा रही हो। खुद को संभालने में लगी थीं कि डॉक्टर ने बताया, हर्निया और गॉल ब्लैडर में स्टोन हो गया है।

शारीरिक तौर पर कमजोर पर हौंसले बुलंद

बार-बार अबॉर्शन, ब्रेस्ट कैंसर, हर्निया और गॉल ब्लैडर में स्टोन! तब जागृति को लगता था कि उनके शरीर के रूप में बीमारियों को एक स्थायी पता मिल गया है। लेकिन उन्होंने एक बेहतर दुनिया के सपने के साथ खुद को जोड़कर जिंदगी की एक नई यात्रा शुरू की।
जागृति के कैंसर का इलाज मुंबई के अस्पताल में चला। वह शारीरिक रूप से कमजोर जरूर हो गईं, लेकिन हौसले बुलंद थे। उन्होंने उपचार के दौरान ही अपने अनुभवों को साझा कर कैंसर से पीड़ित अन्य लोगों की मदद करने का फैसला किया। उनके परिवार के डॉक्टर आलोक ने जागृति को ऐसी ढेर सारी किताबें दीं, जिनमें कैंसर पीड़ितों की मानसिक और शारीरिक मदद के बारे में बताया गया था। जागृति ने उन किताबों को पढ़ा, नोट्स बनाए और सबसे पहले गोरखपुर के हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल में रोगियों से मिलना शुरू किया।

कैंसर मरीजों का बढ़ाती हैं हौंसला

वह हर सोमवार और गुरुवार को वहां जाती रहीं। कैंसर के विभिन्न इलाज के चरणों, जैसे कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के दौरान क्या खाएं, क्या पहनें और कौन-से व्यायाम करें, इसके बारे में मार्गदर्शन करती रहीं। वह पीड़ित के परिवार वालों से भी मिलतीं और बतातीं कि पीड़ित के मनोबल को बढ़ाए रखना है। हालांकि उनके लिए पीड़ितों की यह मदद करना आसान काम नहीं था। यहां तक कि कई डॉक्टर उनसे कहते थे कि “आप यह काम केवल अखबार में छपने और टीवी में आने के लिए करती हैं।” लेकिन वह अपने लक्ष्य पर अडिग रहीं। जागृति बताती हैं, “मैं कीमोथेरेपी करने वाले रूम के बाहर घंटों बैठी रहती। जैसे ही पीड़ित आता, मैं उससे बात करती, उसका हौसला बढ़ाती और कहती कि तुम्हारा जीवन बहुत लंबा है।”


आज उनका यह कार्य उन सभी लोगों के लिए एक प्रेरणा है, जो जीवन में मुश्किलें झेल रहे हैं। उनके इस निस्वार्थ भाव और समर्पण के लिए 2008 में भारतीय चिकित्सा संघ ने उन्हें सम्मानित किया। 69 वर्ष की हो चुकीं और बरसों से ढेर सारी बीमारियों से लड़ रहीं जागृति के पैर अब घर में ही थमने जरूर लगे हैं, लेकिन जब भी उन्हें पता चलता है कि किसी लाचार को उनकी जरूरत है, वह उसके सामने खड़ी मिलती हैं... कुछ सलाह के साथ और ढेर सारे प्यार के मलहम के साथ।

 
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