फुलेंदू बाबू भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान विरोध प्रदर्शन और जुलूस निकालते थे। इसी दौरान 12 अगस्त 1942 को फुलेंदू बाबू ने सारन पुलिस थाने तक जुलूस निकाल रहे थे। उनकी थाने की छत से ब्रिटिश सरकार का झंडा उतार कर भारत का तिरंगा फहराने की योजना थी। हालांकि अंग्रेजो ने जुलूस पर लाठीचार्ज कर दिया और लोगों पर गोली चलाने लगें। तारा रानी के सामने फुलेंदू बाबू को अंग्रेजों ने गोली मार दी। पति सामने घायल पड़े थे, पर तारा कमजोर नहीं पड़ीं।
तारा के हाथ में तिरंगा था, पर उन्होंने पति को इस अवस्था में देखकर भी तिरंगा नहीं छोड़ा। साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर फुलेंदू बाबू को पट्टी बांधी। उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ा और प्रदर्शन जारी रखा। उन्होंने थाने पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। हालांकि जब वह पति के पास वापस लौटी तब तक वह शहीद हो चुके थे। पति की शहादत को उन्होंने जाया न जाने दिया। उनके देहांत के बाद भी स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को जारी रखा। आजादी की लो को जलाए रखा और अंत में तारा रानी व फुलेंदू बाबू समेत तमाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का संघर्ष रंग लाया। 15 अगस्त, 1947 को देश को आजादी मिल गई।