भारतीय रेलवे के इतिहास में एक नई इबारत लिखने वाली एशिया की पहली महिला लोको पायलट सुरेखा यादव अब अपने शानदार करियर को विराम देने जा रही हैं। इस महीने के अंत तक सुरेखा यादव सेवानिवृत्त हो जाएंगी। उनकी 36 वर्षों की सेवा न केवल रेलवे विभाग के लिए गर्व का विषय रही, बल्कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक ऐतिहासिक कदम भी साबित हुआ।
कैसे शुरू हुआ सफर
सुरेखा यादव का जन्म 2 सितंबर 1965 को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में हुआ था। शुरुआत में वो शिक्षिका बनने का सपना देखती थीं और बीएड करने की योजना बना रही थीं, लेकिन इलेक्ट्रिकल डिप्लोमा और तकनीकी पृष्ठभूमि के चलते उनका रुझान रेलवे की ओर हुआ। साल 1986 में उन्होंने सहायक ड्राइवर पद के लिए आवेदन किया, और 1989 में भारतीय रेलवे में बतौर सहायक लोको पायलट उनकी नियुक्ति हुई।
सुरेखा यादव ने रेलवे में प्रवेश करते ही एक इतिहास रच दिया। वो न केवल भारत की, बल्कि पूरे एशिया की पहली महिला ट्रेन ड्राइवर बनीं। एक ऐसे समय में जब ट्रेन ड्राइविंग को पुरुषों का पेशा माना जाता था, सुरेखा ने यह मिथक तोड़ा और खुद को साबित किया।
मालगाड़ी से शुरुआत करने वाली सुरेखा की ड्राइविंग स्किल्स ने जल्द ही उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया। वर्ष 2000 में मोटर महिला के पद पर प्रमोशन मिला। 2011 में मेल एक्सप्रेस ट्रेन चलाने वाली पहली महिला पायलट बनीं। उन्होंने डेक्कन क्वीन जैसी खतरनाक रूट पर भी ट्रेन चलाई, जिससे उनकी क्षमता का लोहा माना गया।
वंदे भारत चलाने वाली पहली महिला पायलट
13 मार्च 2023 को सुरेखा यादव ने एक और कीर्तिमान रचते हुए सोलापुर से मुंबई के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन चलाई। ये न सिर्फ उनके करियर का, बल्कि पूरे भारतीय रेलवे का गर्व का क्षण था।
रेलवे परंपरा के अनुसार, किसी भी पायलट की अंतिम सेवा को विशेष सम्मान के साथ पूरा किया जाता है। सुरेखा यादव ने अपनी अंतिम जिम्मेदारी राजधानी एक्सप्रेस को चलाकर पूरी की। उन्होंने दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन से मुंबई के सीएसएमटी तक ट्रेन चलाई, जो उनकी शानदार सेवा के सम्मान का प्रतीक बन गया।
महिला सशक्तिकरण की प्रतीक
सुरेखा यादव का करियर केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि महिलाओं के लिए नए दरवाज़े खोलने वाला प्रेरणास्रोत है। उनके पहले कदम ने हजारों लड़कियों को यह यकीन दिलाया कि कोई भी क्षेत्र सिर्फ पुरुषों के लिए आरक्षित नहीं होता।