कौन हैं शिप्रा पाठक?
शिप्रा उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में स्थित दातागंज की रहने वाली हैं। उनके पिता डॉ. शैलेश पाठक स्थानीय नेता हैं। दादी संतोष कुमारी पाठक विधायक रह चुकी हैं। शिप्रा खुद एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। उन्होंने इंग्लिश लिट्रेचर से परास्नातक किया है और बाद में सामाजिक सारोकार से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगीं। शिप्रा ने नदियों और पर्यावरण की रक्षा के लिए कई अभियानों का नेतृत्व किया है। इनमें सबसे प्रमुख अयोध्या से रामेश्वरम के लिए 3952 किलोमीटर की पैदल यात्रा- रामजानकी वनगमन यात्रा रही है। उनकी यह यात्रा 108 दिन चली थी और वे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक होकर तमिलनाडु के रामेश्वरम तक पहुंचीं। रास्ते में उन्होंने सरयू, गंगा, यमुना, सरस्वती, मंदाकिनी, तुंगभद्रा, कृष्णा, गोदावरी और वैगई नदियों जल एकत्रित किया और इसी जल से भगवान रामेश्वरम का जलाभिषेक कर पूरे देश को नदियों के संरक्षण का संदेश दिया।
शिप्रा पाठक को क्यों कहा जाता है वाटर वुमेन?
शिप्रा इससे पहले जल संरक्षण की यात्रा कर चुकी हैं, तब उन्हें वाटर वुमेन कहा गया था। शिप्रा मां नर्मदा की 3600 किमी लंबी परिक्रमा कर चुकी हैं। इसके अलावा मानसरोवर परिक्रमा, मां शिप्रा परिक्रमा, सरयू पद यात्रा और ब्रज चौरासी कोसी पद यात्रा कर शिप्रा नदियों के संरक्षण पर जोर देती रही हैं। कुल मिलाकर वे अब तक जल और पर्यावरण संरक्षण के लिए 13 हजार किलोमीटर से ज्यादा की पदयात्राएं कर चुकी हैं। उनकी संस्था पंचतत्व से 15 लाख लोग जुड़े हैं, जिनके सहयोग से नदियों के किनारे 25 लाख पौधे लगाए गए हैं।