कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥
निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥
यानी माता कौशल्या जब बुलाती हैं, प्रभु ठुमक-ठुमक भाग चलते हैं। वेद और शिव ने भी जिनका अंत नहीं पाया, माता उन्हें हठ से पकड़ने दौड़ती हैं।
चारों पहर रामजन्मभूमि पथ को जाने वाला रास्ता छैनी-हथौड़ी लिए मेहनतकशों से पटा हुआ है। कट-कट, धांय-धपड़ आवाजें हैं। धूल से सने हाथ-पांव-चेहरे। सबकुछ जल्दी-जल्दी पूरा कर देने की धुन। किसी दिव्य उत्सव की तैयारी का अद्भुत जोश है यह। पत्थरों को तराशते जाने कितने हाथ हैं, जिन्हें 21 जनवरी के पहले रामजन्मभूमि पथ तैयार करने का जिम्मा मिला है। यह सब यूपी पुलिस की सुरक्षा के हवाले है। वहीं, कुछ दूरी पर एनएसजी कमांडो कागज पर लगातार कुछ नोट कर रहे हैं। हर दरीचे, हर मुहाने और कदमों की छाप पर उनकी नजर है।
आखिरी बैरिकेडिंग के पहले कुछ लोग इंतजार कर रहे हैं भोग आरती में जाने का। हाथ में विशेष पास हैं। चारों भाइयों के साथ टेंट में विराजे रामलला विराजमान को देखने के लिए कदम रोके खड़े हैं। जैसे ही सुरक्षा जांच पूरी होती है, दौड़ पड़ते हैं। इनमें वह बेटी भी शामिल है, जो दिल्ली से लगातार दूसरे दिन यहां दर्शन करने आई है। उनकी 75 वर्षीय मां मुन्नीबाई अस्पताल में वेंटिलेटर पर हैं।
मां को रामलला के दर्शन करवाने थे, इसलिए कल भी आई थीं। जब तक भीतर पहुंचीं, अस्पताल में मां बेहोश हो गई थीं, दर्शन नहीं कर पाईं। शुक्रवार को जब मां को होश आया, तो दोबारा दौड़ी आईं। फोन ले जाने की इजाजत नहीं है, इसलिए वहां मौजूद सुरक्षा गार्डों से कहा, मां को वीडियो कॉल से दर्शन करा दें। हॉस्पिटल के बेड पर तारों, मशीनों से घिरी मां गार्ड के छोटी स्क्रीन वाले मोबाइल पर रामलला के दर्शन कर निहाल हो उठीं।
यह भोग आरती के खास दर्शन हैं। दिन में बमुश्किल 30-35 लोगों को ही इसमें आने को मिलता है। और जो पहली बार यहां पहुंचता है, उसका अत्यंत भावुक हो जाना लाजमी है। पर्दा खुलता है और हाथ खुद-ब-खुद जुड़ जाते हैं। होठों पर रामधुन होती है और बिना कहे, बिना बुलाए राम आखों में आंसू बनकर उतर जाते हैं।
यह सबके जीवन में बसे राम की एक कहानी भर है, पर अयोध्याजी ऐसी तमाम कहानियों से भरे-पड़े हैं। 2019 में रामजन्मभूमि का फैसला आने से पहले बमुश्किल 3 हजार लोग दर्शन के लिए आते थे। आज हर दिन 25-30 हजार लोग आ रहे हैं। उनके अलावा ऐसे कई लोग हैं, जिनके हिस्से रामलला के दर्शन तो नहीं आते, पर उनके हिस्से के अपने-अपने राम हैं।