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Ram Mandir Pran Pratishtha : लगा...जैसे मूर्ति बोल उठेगी और साजिशों के भेद खोलेगी

Tue, 23 Jan 2024 04:30 AM IST
दुष्यंत शर्मा हेमंत शर्मा, अयोध्या

सार

आंखें झर-झर, झर रही हैं। धरती पुलकित है। हवाएं राममय हैं। अयोध्या गौरवान्वित है। देश मगन है। सिर गर्व से ऊंचा है। सीना उल्लास में चौड़ा। और, जीवन यह दृश्य देखकर धन्य। पांच सौ साल का संघर्ष अपने मकसद में कामयाब रहा।
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पीएम मोदी ने भगवान श्रीराम के चरणों में फूल चढ़ाए। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रामलला विराज गए। देश झूम रहा है। मन हर्षित है और हृदय आह्लादित। आंखें झर-झर, झर रही हैं। धरती पुलकित है। हवाएं राममय हैं। अयोध्या गौरवान्वित है। देश मगन है। सिर गर्व से ऊंचा है। सीना उल्लास में चौड़ा। और, जीवन यह दृश्य देखकर धन्य। पांच सौ साल का संघर्ष अपने मकसद में कामयाब रहा।

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रामलला वर्षों तक टेंट में रहे, धूप और बारिश देखी, आज अपने जन्मस्थान पर लौट आए। उनके माथे पर तिलक, अक्षत। मेरी आंखों के सामने इतिहास का एक चक्र पूरा हुआ है। बाबर ने तलवार के बूते जिस आस्था का ध्वंस चाहा था, वह आस्था पांच सौ साल बाद देश के आहत स्वाभिमान की पुनर्स्थापना करते फिर से उठ खड़ी हुई है।

अयोध्या में जो भारतीयता का तीर्थ बना, वह सिर्फ एक मंदिर नहीं, हमारी सनातनी आस्था का शिखर है। यह बदलते भारत का प्रतीक है। मोदी की गारंटी का सबूत है। आज जब ललाट पर वैष्णव उर्ध्वपुंड लगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भगवान राम के विग्रह में प्राण प्रतिष्ठित कर रहे थे, तो मानो कह रहे हों...दुनिया वालो सुनो! राम थे, हैं और रहेंगे। कोई ताकत राम के अस्तित्व पर सवाल खड़ा नहीं कर सकती।
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ऐश्वर्य से जगमग और भक्ति में लिपटी अयोध्या उस रोज से भी ज्यादा मगन और सजी थी, जिस रोज त्रेता में भगवान राम लंका जीत कर लौटे थे। तब भी दिवाली मनी थी। आज देश ने महादीपावली मनाई। कभी नरेंद्र मोदी राम मंदिर के लिए लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के सारथी थे। पर संयोग देखिए, आज वह इस अभियान के रथी थे। और दुनिया को संदेश दे रहे थे कि यह मंदिर बदलते भारत का प्रतीक भी है, जिसमें किसी भी अन्याय के प्रतिकार की ताकत है। 

प्राण प्रतिष्ठा से पहले जब विग्रह की आंख से पट्टी हटाई गई, तो आंखें चुंधियां गईं। शरीर रोमांचित था। लगा मूर्ति अभी खुद बोलेगी। अपने खिलाफ हुए षड्यंत्रों के भेद खोलेगी। एक फरवरी, 1986 को जब ताला खुला, तब मैंने उन छोटे वाले रामलला के दर्शन किए थे, जो आज भी यहां विराजमान थे। नए रामलला कर्नाटक के तुंगभद्रा नदी के काले पत्थर से बने हैं। मूर्ति अद्भुत, अपूर्व, मनोहारी है।

भगवान का रूप दूर्वादल श्याम है। चेहरा प्रसन्न नीलाभ चंद्रमंडल की तरह हैं, जिससे तेज, आभा, प्रकाश, माधुर्य, कोमलता और सौरभ का झरना झर रहा है। आंखें तुरंत खिले कमल की तरह। अजानबाहु इस प्रतिमा में कोई तृषा या ताप नहीं है। बिल्कुल प्रियदर्शन। 
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(लेखक विवादित ढांचा गिरने, कारसेवा, शिलान्यास, हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के चश्मदीद हैं...अब प्राण प्रतिष्ठा के भी)

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