तुलसी के राम को मैं अपने सबसे करीब पाता हूं। जिन राम को तुलसी ने सृजित किया है, उनमें लालित्य है। वह मोहक हैं, आकर्षक हैं। सबको मुग्ध कर लेते हैं। उनकी शख्सियत का हर कोण आदर्श है।
इस आदर्श तक पहुंचने की कोशिश भी मैं करता रहा हूं। राम का पर्याय ही सरल और सहज हो जाना है। वह बार-बार इसे साबित भी करते हैं। प्रकृति, परिवार, मित्र और शत्रु सबसे उनका व्यवहार हर जगह सरल भी है, सहज भी। भारतीय चेतना में यही राम मौजूद हैं। यही सब में रचे-बसे हैं। मुझमें भी वही हैं। इससे बाहर जाकर मैं राम को नहीं देख पाता।
यह राम नाम की स्वीकार्यता ही है कि उर्दू व फारसी में भी इन पर खूब लिखा गया है। जिसने भी कलम चलाई है, उसने राम को तुलसी से ही जाना-समझा है। मीर तकी मीर लिखते हैं, 'सेहर किया एजाज किया, जिन लोगों ने तुझ को राम किया।'
सीधी सी बात है कि जहां मान मनौवल, प्रेम, सहमति सरीखे भाव हैं, वहां राम सहज रूप से मौजूद हैं। यही राम मुझे भी प्रिय हैं। एक बात और। यह इसलिए भी संभव हो सका कि तुलसी परंपरा से मिले राम को जस का तस नहीं स्वीकारते।
वह राम से जैसे लगातार संवादरत रहते हैं और इस क्रम में अपने आराध्य का निर्माण करते हैं। यह आराध्य मानवीय है। सबका कल्याण चाहने वाला है। और इस भरोसे से पैदा हुआ है कि वह किसी का अहित नहीं कर सकता। मैंने अपने नाटक महाबली में इसका जिक्र भी किया है।
-असगर वजाहत, साहित्यकार