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Ram Mandir: रामधुन के साथ शिलाओं को गढ़ रहे झींगू और साथियों के छेनी-हथौड़े; बोले- हमारा तो जीवन धन्य हो गया

Tue, 09 Jan 2024 10:03 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या

सार

Ayodhya Ram Mandir: झींगू और साथियों के छेनी-हथौड़े शिलाओं की छंटाई का काम कर रहे हैं। झींगू का कहना है कि हमारा जीवन धन्य हो गया कि शिलाओं की छंटाई का काम हमें मिला है। झींगू ने बताया कि जब यहां आए थे, 115 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिला करती थी। डेढ़ वर्ष पहले से 600 रुपये प्रतिदिन मिलने लगी।
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Ayodhya Ram Mandir - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मिर्जापुर के अचितपुर गांव निवासी झींगू, उनके परिजन और गांव के लोग रामधुन गाते हुए मंदिर के लिए शिलाओं पर दनादन छेनी-हथौड़े चला रहे हैं। सभी उस वक्त से शिलाओं को गढ़ने में लगे हैं, जब यह भी पता नहीं थी कि मंदिर बनेगा या नहीं।
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झींगू कहते हैं...रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है। जीवन धन्य हो गया कि शिलाओं की छंटाई का काम हमें मिला। उन्होंने बताया कि राममंदिर के लिए पत्थरों का काम शुरू हुआ, तो उसे चढ़ाने-उतारने व उसकी सफाई के लिए कारीगरों की जरूरत थी। 

अन्नू सोमपुरा को पता चला कि मिर्जापुर में ऐसे काम करने वाले लोग हैं। उनके बुलावे पर गांव के शंभू, महेश व घूरेलाल 1990 में अयोध्या आए थे। बाद में रामनरेश आ गए। मैं और संपत 2001 में आए। शंभू व महेश अब नहीं रहे। संपत-घूरेलाल अधिक उम्र के चलते लौट गए। मैं व रामनरेश अब भी काम कर रहे हैं।
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झींगू बताते हैं कि 2002 में शिलापूजन का कार्यक्रम था। हजारों कारसेवक अयोध्या आए थे। माहौल गरम था। तय हुआ कि एक शिला केंद्र सरकार के प्रतिनिधि को दी जानी है। 

तब हम छह लोगों को चयनित रामशिला को कार्यशाला से हनुमानगढ़ी मंदिर पहुंचाने की जिम्मेदारी मिली। हम ट्रॉली पर शिलाएं लेकर पहुंचे, जिसे रामचंद्र दास परमहंस व अशोक सिंघल ने केंद्र के प्रतिनिधि को सौंपा था।

 

अब मिल रहे 600 रुपये रोज 
झींगू ने बताया कि जब यहां आए थे, 115 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिला करती थी। 2011 में बढ़कर 7,500 रुपये महीने हो गई। डेढ़ वर्ष पहले से 600 रुपये प्रतिदिन यानी 18 हजार रुपये महीने मिलने लगा। कहते हैं, यहां खान-पान का पूरा बंदोबस्त है।
 

नेपाल, राजस्थान व कर्नाटक से आईं शिलाओं पर शुरू नहीं हो सका काम
आपको बता दें कि नेपाल के कालीगंडकी तट से पिछले साल दो बड़ी शिलाएं आईं थीं। इनका वजन 14 और 27 टन है। इन शिलाओं को जनकपुर के जानकी मंदिर से भेजा गया था। उस समय पूरे देश में उनका पूजन और सत्कार हुआ। चर्चा रही कि इन्हीं शिलाओं से श्रीराम और बाकी भाइयों की मूर्तियां तैयार होंगी। 

 

अब रामलला की मूर्ति तैयार हो गई है। यह शिला कार्यशाला के समीप रामसेवकपुरम में संरक्षित कर रख दी गई हैं। ट्रस्ट महासचिव चंपत राय से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि अभी कुछ तय नहीं हो सका है। इस सवाल पर कि क्या इन्हें नेपाल वापस किया जाएगा, चंपत राय कहते हैं कि नहीं, पूरा सम्मान होगा। मगर अभी कुछ तय नहीं।

 
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कर्नाटक से तीन श्याम शिलाएं आई हैं। ये भी यहीं संरक्षित हैं। राजस्थान से भी तीन शिलाएं आई हैं। कार्यशाला में काम में लगे एक व्यक्ति की माने तो नेपाल से आई दोनों शिलाओं को राममूर्ति के लिए उचित नहीं माना गया। कुछ तकनीकी जांच के बाद मूर्तिकारों ने कहा था कि इस शिला से मूर्ति तराशना संभव नहीं है। चर्चा यह भी रही कि कुछ संतों ने कहा कि कालीनदी की चट्टानों को तोड़ा नहीं जाना चाहिए, क्योंकि वे शालिग्राम के बराबर हैं।
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