निर्मोही अखाड़ा में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक (फाइल फोटो)
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निर्मोही अखाड़ा रामानंदीय संप्रदाय के साथ विभिन्न अखाड़ों के 150 शीर्षस्थ धर्माचार्यों की अगवानी करेगा। ये सभी संत 22 जनवरी को रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शिरकत करने यहां आ रहे हैं। राम मंदिर निर्माण के ऐतिहासिक मौके पर निर्माेही अखाड़े की नौ शाखाओं के बीच परंपरागत आपसी मतभेद की गुंजाइश भी खत्म हो गई है। इनके सभी पंच हंसी-खुशी एक साथ समारोह में जाएंगे।
आजीवन भोग अर्पित करने के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने दी सहमति
सीता राम चरन रति मोरे। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरे... जब तक जीवित रहें, श्री सीता-रामजी आपके चरणों में आपकी कृपा से प्रेम दिन-दिन बढ़ता ही रहे।... इस भाव के साथ न जाने कितने भक्त इन दिनों रामलला की सेवा के लिए कुछ न कुछ अर्पित करने के लिए बेसब्र हैं। इसी भावना के अनुरूप गुजरात की धार्मिक संस्था जलाराम बापा मंदिर ने नए मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित होने वाले रामलला को आजीवन भोग अर्पित करने का संकल्प लिया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से इसकी सहमति भी मिल गई है।
संत जलाराम बापा मंदिर गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गांव में स्थित है। इस मंदिर के भक्त गुजरात के व्यवसायी सतीश ठक्कर ने अमर उजाला को बताया कि मंदिर की ओर से पिछले 250 वर्षों से अनवरत अन्न क्षेत्र (भंडारा) संचालित किया जा रहा है। मंदिर के गादीपति रघुराम बापा ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से रामलला को सुबह व शाम लगने वाले भोग की आजीवन व्यवस्था करने का निवेदन किया था, जिसे ट्रस्ट ने स्वीकार कर लिया है। रामलला को रोजाना व त्योहारों पर जो भी भोग अर्पित करने की परंपरा है, उसी के तहत व्यवस्था की जाएगी। 22 जनवरी से ही रामलला के लिए आजीवन भोग की व्यवस्था शुरू कर दी जाएगी।
सतीश ठक्कर ने बताया कि मंदिर के संस्थापक संत जलाराम बापा की श्रीराम में अगाध निष्ठा थी। वे गुजरात में भगवान के रूप में पूजे जाते थे। संत जालाराम हर धर्म और जाति के लोगों को खाना खिलाते थे। इसलिए ये मंदिर हमेशा से लोगों को भोजन खिलाता आ रहा है। वर्ष 2000 से मंदिर के ट्रस्ट ने हर प्रकार की भेंट स्वीकार करना बंद कर दिया। आज तक साल के पूरे 365 दिन हजारों लोग मंदिर में आते हैं पर कोई भूखा नहीं जाता। संत जलाराम बापा की परंपरा को वर्तमान गादीपति रघुराम बापा बढ़ा रहे हैं। बहुत से ऐसे भक्त हैं जो पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं। इस मंदिर को चला रहे हैं। इस मंदिर में कोई दान पात्र तक नहीं है। संवाद