लोकसभा चुनाव 2019 में 17 राज्यों में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिल पाई है। म.प्र. में केवल नकुलनाथ, उप्र. में यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और बिहार में किशनगंज सीट से केवल डा. जावेद चुनाव जीतने में सफल हो पाए। कांग्रेस अध्यक्ष को उम्मीद थी कि चुनाव में करारी हार के नतीजे के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए प्रमुख पदों से इस्तीफा देेने का प्रस्ताव करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ? यहां तक कि राहुल गांधी के पद से इस्तीफा देने, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी चिदंबरम पर सवाल उठाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ।
कांग्रेस अध्यक्ष पार्टी में हर जिम्मेदार व्यक्ति नैतिक जिम्मेदारी को तय करने की व्यवस्था चाहते हैं। उन्हें उम्मीद थी कि उनके इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस कुछ और बड़े नेता पहल करेंगे। पार्टी और संगठन में इस तरह की पहल के बाद कामकाज के की आगे की संस्कृति को सुदृढ़ रूप दिया जा सकेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पार्टी के विधिक मामलों के विवेक तनखा ने हाल में अपने पद से इस्तीफा दिया, लेकिन अन्य नेताओं को जूं तक नहीं रेगी।
दरअसल कांग्रेस पार्टी के भीतर लगभग सभी नेताओं का मानना है कि देश की जनता में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विश्वास बना हुआ है। इसके कारण 2019 में मोदी सरकार पहले से ज्यादा सांसदों के साथ लोकसभा में पहुंचने में सफल रही। दूसरे कांग्रेस पार्टी में निर्णय भी काफी देर से होते हैं। पद छोडऩे के बाद आगे की राजनीति को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। इसलिए नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष की गंभीरता को समझने के बाद भी चुप्पी साध ली।
राहुल गांधी के कार्यालय के एक वरिष्ठ सूत्र की माने तो कांग्रेस अध्यक्ष ने 25 मई के बाद लोगों से मिलने-जुलने का विचार त्याग दिया। वह विदेश यात्रा पर भी नहीं गए। उन्होंने साफ कर दिया कि नया अध्यक्ष चुन लिया जाए और यह अध्यक्ष नेहरू गांधी परिवार का व्यक्ति न हो। प्रियंका भी नहीं। उनके इस स्टैंड के बाद पार्टी के नेताओं में उन्हें मनाने की होड़ लग गई। तमाम प्रदेशों के नेता और कुछ मुख्यमंत्री भेंट मुलाकात के लिए समय मांगने लगे। लेकिन किसी ने अपनी नैतिकता पर अधिक जोर नहीं दिया।
गुरुवार को राहुल गांधी ने हरियाणा के नेताओं से भेंट और चर्चा की। बैठक में हिस्सा लिया। ताजा हालात जाना, सबको ध्यान से सुना और अपनी कुछ नसीहतें दी। महाराष्ट्र के नेताओं से भी मिले। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से मिले। चर्चा की। पिछले सप्ताह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से भी मिले थे। पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू को लेकर बढ़ रही तकरार भी उन्हें चिंतित कर रही है।
कैप्टन ने पंजाब में लोकसभा की सीटें जिताकर और चुनाव प्रचार में सही स्टैंड लेकर कांग्रेस अद्यक्ष को खुश किया है, लेकिन राहुल गांधी पार्टी में एक जुटता और अनुशासन चाहते हैं। कांग्रेस के नेताओं को उम्मीद है कि अब संवाद, मिलना-जुलना शुरू हुआ है तो आगे का रास्ता भी निकलेगा। पार्टी के संगठन से जुड़े एक बड़े नेता ने कहा कि मणि शंकर अय्यर ने लाइन दे दी है। आने वाले समय में वही होगा। बिना राहुल गांधी, सोनिया गांधी के कांग्रेस पार्टी का भला नहीं हो सकता। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनौतियों से मुंह नहीं मोड़ सकते।