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मोदी Vs ममता: इस बार बंगाल में है सबसे बड़ी जंग, जो जीतेगा वही बनेगा सिकंदर

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बंगाल में भाजपा-टीएमसी की जंग - फोटो : अमर उजाला
लोकसभा चुनाव 2019 में इस बार सबसे दिलचस्प मुकाबला जिस राज्य में दिख रहा है वो उत्तर भारत से नहीं बल्कि पूर्वी भारत से है। इस राज्य में ऐसे सियासी हालात बने हैं कि मौजूदा सत्ताधारी पार्टी को उत्तर भारत की पार्टी कही जाने वाले दल से कड़ी चुनौती मिल रही हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल की जहां का सियासी माहौल इस बार बदला-बदला सा नजर आ रहा है। राजनीति के जानकार भी यहां के मुकाबले पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। इस बार भाजपा और टीएमसी के बीच जबरदस्त मुकाबला नजर आ रहा है। कभी इन दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था, लेकिन आज एक दूसरे को कड़ी चुनौती दे रही हैं। आइए जानते हैं कि किस तरह ममता बनर्जी ने यहां मजबूती से पैर जमाकर वामदलों को उखाड़ फेंका और कैसे भाजपा आज टीएमसी को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी बन गई। 
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ममता बनर्जी
करीब 26 साल तक कांग्रेस में रहने के बाद ममता बनर्जी ने 1998 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई। चुनाव आयोग ने इसे दो फूल और घास का चुनाव चिन्ह् दिया। इसके बाद से बंगाल में ममता की ऐसी लहर उठी कि वामदल का सूपड़ा साफ हो गया। 2011 विधानसभा चुनाव के बाद से ही बंगाल में टीएमसी की सरकार है। तब ममता ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन अगले चुनाव में अकेले ही मैदान पर उतरीं और प्रचंड बहुमत हासिल किया।  
 
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rahul and sonia - फोटो : PTI
लेकिन पिछले एक-दो सालों के दौरान बंगाल की हवा में कुछ तब्दीली आती दिख रही है। करीब आठ साल से तृणमूल कांग्रेस का यहां एकछत्र राज है। 2011 में ममता दीदी की लहर में वामदलों के पैर ऐसे उखड़े कि आज तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सके। साल 2000 के दौर में कांग्रेस की असली ताकत ही ममता थीं, सो उनके जाने के बाद कांग्रेस भी कमजोर हो गई। कभी नंबर दो रही कांग्रेस आज यहां तीसरे-चौथे नंबर पर पहुंच गई है।  
 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
साल 2000 के बाद असली मुकाबला टीएमसी और वामदलों के बीच रह गया था। कांग्रेस भी दूसरे नंबर पर आने के लिए हाथ-पैर मार रही थी। दोनों दल टीएमसी को चुनौती देने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए थे। लेकिन इसी दौरान एक ऐसी पार्टी ने एंट्री ली जो किसी रेस में ही नहीं थी। ये थी भाजपा। भाजपा ने कुछ ऐसे मुद्दों को भुनाया जिसने उसे यहां नंबर दो पार्टी बना दिया। पिछले कुछ सालों में यहां भाजपा के उभार ने टीएमसी को चिंता में डाल दिया। 2016 विधानसभा चुनाव में भाजपा को भले ही महज तीन सीटें मिली हों, लेकिन स्थानीय चुनाव में उसने टीएमसी को जबरदस्त चुनौती दी। वह नंबर दो की पार्टी बनकर उभरी। टीएमसी ने भी आने वाले खतरे को भांपते हुए भाजपा को प्रमुख विपक्षी के तौर पर लेना शुरू कर दिया। 
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तृणमूल कांग्रेस
2016 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 294 में से 211 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया। 2011 विधानसभा चुनाव कांग्रेस और टीएमसी ने मिलकर लड़ा था और लेफ्ट फ्रंट के 35 साल के शासन का अंत कर दिया था। ममता की पार्टी ने 184 सीटों पर कब्जा जमाया था। ऐसी खबरें आईं कि ममता की नीतियों से शहरी वोटर नाखुश है, लेकिन 2016 के चुनाव में ममता ने 211 सीटों पर कब्जा जमाकर सभी कयासों को गलत साबित कर दिया। हालांकि चुनाव में जिस कदर हिंसा हुई उसकी आलोचना भी ममता को झेलनी पड़ी। 
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ममता बनर्जी
आठ साल के शासन के दौरान ममता बनर्जी पर अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण के आरोप लगे। इसी मुद्दे ने भाजपा को यहां पैर जमाने का मौका दिया। ममता के कई फैसलों ने भाजपा को अपनी पहचान मजबूत करने और लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने में मदद की। ममता सरकार के कई फैसलों के खिलाफ भाजपा ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया। 2017 में दुर्गा पूजा-मुहर्रम का विवाद सुर्खियों में छाया रहा। कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता सरकार से सख्त लहजे में कहा कि दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर रोक के उनके फैसले का औचित्य क्या है। वह समाज को सांप्रदायिक आधार पर क्यों बांट रही हैं? 
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ममता बनर्जी
ममता बनर्जी ने आदेश दिया था कि मुहर्रम के चलते 30 सितंबर को शाम 6 बजे बाद दुर्गा विसर्जन को अनुमति नहीं दी जाएगी। इस फैसले के खिलाफ भाजपा ने हाई कोर्ट में अपील की जहां ममता सरकार को फटकार लगी। इस मुद्दे ने भाजपा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। लोगों के बीच संदेश गया कि ममता सरकार मुस्लिमों का तुष्टिकरण करती है। लोगों में इसे लेकर नाराजगी फैली। भाजपा को सीधे तौर पर इसका फायदा मिला। खास बात ये है कि 2016 में भी ममता सरकार ने मूर्ति विसर्जन को लेकर इसी तरह का आदेश दिया था।
 

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प. बंगाल में भिड़ंत - फोटो : सोशल मीडिया
2017 के बाद से ही यहां टीएमसी को भाजपा चुनौती पेश करने लगी थी। जो खूनी भिड़त पहले टीएमसी-वामदलों के बीच हुआ करती थी, अब भाजपा-टीएमसी के बीच होने लगी। भाजपा के कई दफ्तरों, नेताओं के घरों-दफ्तरों को निशाना बनाया गया। कई भाजपा कार्यकर्ताओं की मौत भी हुई। इसी बीच ममता ने केंद्र सरकार का खुले तौर पर ऐसा विरोध किया जो पहले कभी दिखाई नहीं पड़ा। कोलकाता के पुलिस प्रमुख राजीव कुमार से सीबीआई पूछताछ के बाद ममता धरने पर बैठ गईं। दिसंबर 2018 में राज्य में सीबीआई को जांच से रोका। दिसंबर 2018 में ही केंद्र के साथ डेटा शेयरिंग से भी इनकार किया। 

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ममता बनर्जी - फोटो : पीटीआई
दिसंबर 2018 में ममता सरकार ने राज्य में भाजपा की रथ यात्रा पर रोक लगाई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। कुछ दिनों पहले ही चुनाव प्रचार के दौरान यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के हेलीकॉप्टर को दिनाजपुर में उतरने की अनुमति भी नहीं दी गई। भाजपा-टीएमसी की इसी जंग ने बंगाल में 2019 आम चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह के तीखे बयान बंगाल में नेताओं के मुंह से सुनाई पड़ रहे हैं, वैसा नजारा किसी और राज्य में दिखाई नहीं देता। इन बयानबाजियों की गूंज पूरे देश में है। 

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Mamata Banerjee Vs Narendra Modi
टीएमसी की तरफ से ममता भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं। वहीं, भाजपा की तरफ से पीएम मोदी और अमित शाह, ममता पर हमला बोलते हैं। दोनों की तरफ से वार-पलटवार का खेल बदस्तूर जारी है। यहां मोदी-शाह की रैली के बाद ममता के हमले और तीखे हो जाते हैं। भाजपा की तरफ से भी तीखे वार किए जाते हैं। इतनी सख्त बयानबाजी का दौर और किसी राज्य में दिखाई नहीं दे रहा। साफ नजर आ रहा है कि असली मुकाबला इन दो दलों के बीच ही है। अमित शाह ने यहां 23 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। यहां कुल 42 सीटें हैं जो 2019 लोकसभा चुनाव में अहम भूमिका अदा करेगी। 

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west Bengal election (file photo) - फोटो : pti
देश में सात चरणों में चुनाव हो रहा है। तीन चरणों का मतदान हो चुका है। बंगाल ऐसा राज्य रहा जहां चुनाव आयोग ने सबसे ज्यादा सुरक्षाबलों की तैनाती की। भारी पैमाने पर अधिकारियों के तबादले हुए। इसे लेकर ममता ने चुनाव आयोग पर भाजपा के साथ मिलीभगत जैसा आरोप भी लगाया। उन्होंने ये भी कहा कि केंद्रीय बल भाजपा के पक्ष में काम कर रहे हैं। बंगाल में तीनों दौर में मतदान हुआ है। इस दौरान यहां भारी मतदान हुआ जिसने सियासी पंडितों की धड़कनों को भी बढ़ा दिया है। तीनों चरणों में अमूमन 80 फीसदी मतदान हुआ है। इस दौरान राज्य में भारी हिंसा भी हुई है। अब तक के मतदान में ये एकमात्र राज्य रहा जहां सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी के बावजूद हिंसा हुई और लोगों की जान गई। 
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Mamata Banerjee
भाजपा जहां मिशन 23 के साथ काम कर रही है, वहीं ममता भाजपा को रोकने की पुरजोर कोशिश में है। इस समय टीएमसी के पास 34 सीटें हैं, और इस आंकड़े को वह हर हाल में बढ़ाना चाहती है। बंगाल इस मायने में भी अहम है कि अगर भाजपा यहां जीत का परचम लहराने में कामयाब हुई तो यूपी में होने वाले संभावित नुकसान की कुछ हद तक भरपाई हो सकेगी। इसके उलट अगर ममता ने इस बार 34 का आंकड़ा भी पार कर लिया तो राष्ट्रीय स्तर पर उनका कद और बढ़ जाएगा। वह खुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदार के तौर पर भी आगे कर सकती है। ऐसा होने पर राष्ट्रीय राजनीति में उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ जाएगी और वह विपक्ष के महागठजोड़ की सर्वमान्य नेता के तौर पर उभर सकती हैं। 
 
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