फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मोहन भागवत बोले- कोरोना महामारी के दौर में पूरी दुनिया जीने के लिए भारतीय तरीकों को अपना रही है

Tue, 06 Oct 2020 04:36 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, जयपुर
विज्ञापन
मोहन भागवत (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook
विज्ञापन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि पूरी दुनिया कोरोना महामारी के बीच अपनी वृद्धि और जीविका के लिए भारतीय जीवन के बुनियादी तत्वों को अपना रही है और कोरोना महामारी के दौर में जीवन निर्वाह कर रही है। उन्होंने कहा कि इस समय पूरी दुनिया एक बार फिर विकास की भारतीय विचार परंपरा की ओर लौटी है और उसे बड़ी उम्मीद से देख रही है।

विज्ञापन


उन्होंने कहा कि 50 साल पहले, विदर्भ के नेडप काका जैविक खाद की एक योजना लेकर केंद्र के पास गए, लेकिन उस योजना को सिर्फ इसलिए कचरे में डाल दिया गया कि वह स्वदेशी दिमाग द्वारा विकसित किया गया था, लेकिन आज दुनिया के सामने कोई और विकल्प नहीं है।


कोटा में एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि 'पूरी दुनिया पिछले छह महीनों में कोरोना वायरस द्वारा पस्त होने के बाद पर्यावरण के अनुकूल होने के लिए विकास के तरीकों का अभ्यास करने के लिए भारतीय विचार प्रक्रिया के मूल तत्वों की ओर लौट रही है और आशा से देख रही है।' भागवत भारतीय मजदूर संघ के नेता दत्तोपंत ठेंगडी की 100वीं जयंती पर एक समारोह को संबोधित कर रहे थे।
विज्ञापन


दत्तोपंत ठेंगडी की दूरदर्शिता और उनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए, भागवत ने कहा कि 'भारत में कृषि कभी भी व्यापार का विषय नहीं थी, लेकिन दुनिया इसे कृषि अर्थशास्त्र के रूप में देखती है। उन्होंने कहा कि हमने खेती को हमेशा प्रकृति के आशीर्वाद के रूप में देखा है और किसान के लिए कृषि कर्म एक धर्म है। कृषि को हमने व्यापार करने के साधन के तौर पर नहीं, बल्कि इसे वैभव की देवी लक्ष्मी की आराधना के रूप में देखा है, व्यापार के संचालन के साधन के रूप में नहीं।' 

उन्होंने कहा कि कृषि का अर्थशास्त्र का पहलू बुरा नहीं है, लेकिन लोग यह देखने में विफल हैं कि लोगों का एक वर्ग व्यापार के लिए दूसरों का शोषण करना चाहता है। उन्होंने कहा कि दत्तोपंत ठेंगडी की जयंती समारोह उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए आभार प्रकट करने के लिए है। उन्होंने कहा कि खेती-बाड़ी को पूरी दुनिया का पोषण करने वाली बनाने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि 'हमें अनुभव और सिद्ध प्रमाणों के आधार पर आदर्श कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा। भारत में दस हजार साल का कृषि अनुभव है, इसलिए पश्चिम से पर्यावरण विरोधी प्रथाओं को शामिल करना जरूरी नहीं है।'

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें