राजस्थान हाईकोर्ट ने सत्र 2026-27 की बीएससी एग्रीकल्चर काउंसिलिंग में शामिल होने की मांग करने वाले कई निजी कृषि कॉलेजों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कृषि विभाग ने आईसीएआर मानकों, योग्य शिक्षकों, बैंक के माध्यम से वेतन भुगतान, पीएफ कटौती और बायोमीट्रिक उपस्थिति जैसी शर्तों का पालन नहीं होने के कारण कॉलेजों की एनओसी बढ़ाने से इनकार किया था।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए बी.एससी. एग्रीकल्चर पाठ्यक्रम की काउंसिलिंग प्रक्रिया में प्रवेश की मांग करने वाले निजी एग्रीकल्चर कॉलेजों की याचिकाओं को खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद सत्र 2026-27 की काउंसिलिंग प्रक्रिया में केवल वही संस्थान हिस्सा ले सकेंगे जो सभी निर्धारित मानकों का पूरी तरह से पालन कर रहे हैं।
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शिक्षा की गुणवत्ता पर कड़ा रुख
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश डॉ. नूपुर भाटी की पीठ ने कहा कि शिक्षा के गिरते स्तर और तय मानकों की अनदेखी को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत के इस सख्त रुख से उन तमाम निजी शैक्षणिक संस्थानों को बड़ा झटका लगा है जो जरूरी मापदंडों को पूरा किए बिना छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे थे। याचिका दायर करने वाले संस्थानों में एस.के.डी. एग्रीकल्चर कॉलेज और श्री विनय कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर समेत कई अन्य निजी संस्थान शामिल थे, जिन्होंने कृषि विभाग के आदेश को अदालत में चुनौती दी थी।
कृषि विभाग का एनओसी से इन्कार
दरअसल कृषि विभाग ने अपने आदेश में इन निजी कॉलेजों की एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) अवधि को आगे बढ़ाने से साफ इन्कार कर दिया था। विभाग की ओर से स्पष्ट किया गया कि ये कॉलेज भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मानकों, योग्य शैक्षणिक स्टाफ की नियुक्ति, बैंक खातों के माध्यम से वेतन भुगतान, पीएफ कटौती और बायोमीट्रिक उपस्थिति जैसी अनिवार्य शर्तों को पूरा नहीं कर रहे थे। इन अनिवार्य मापदंडों की अनदेखी के चलते ही विभाग ने एनओसी बढ़ाने से मना किया था।
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नियमों की अनदेखी पर अदालत का रुख
याचिकाकर्ता कॉलेजों की ओर से अदालत में तर्क दिया गया था कि नीति के तहत उन्हें एक्रीडेशन प्राप्त करने के लिए छह साल का समय मिला हुआ है, इसलिए उनकी एनओसी रद्द नहीं की जा सकती। हालांकि अदालत ने निजी संस्थानों की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक्रीडेशन के लिए समय मिलने का यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि संस्थान निर्धारित नियमों की अवहेलना करना शुरू कर दें।
स्वतः ही मान्यता या संबद्धता का अधिकार नहीं
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निजी संस्थानों की स्थापना के अधिकार का मतलब यह कतई नहीं है कि उन्हें बिना नियमों का पालन किए स्वतः ही मान्यता या संबद्धता का अधिकार प्राप्त हो जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन संस्थानों ने पूर्व में शपथ पत्र देकर सभी मानकों को निर्धारित समय में पूरा करने का वादा किया था, लेकिन बाद में वे अपनी सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारियों से पीछे हट गए। अब आगामी काउंसिलिंग प्रक्रिया में केवल पारदर्शी और मानकों के अनुरूप कार्य करने वाले संस्थान ही भाग ले सकेंगे।