भारत के रेगिस्तानी राज्य राजस्थान के एक गांव में रहने वाली गौरी मीणा ने समय से दो महीने पहले ही अपने बेटे को जन्म दिया।
नवजात शिशु का वजन सामान्य शिशुओं के औसत वजन के आधे से भी कम महज 1।2 किलोग्राम था। बच्चे की कमजोर हालत देखकर मीणा और उनके पति देवीलाल उसके जीवित बचने की उम्मीद खो चुके थे, लेकिन आस फिर भी बाकी थी।
एक स्थानीय डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने नवजात शिशु को एक मोटे कंबल में लपेटा और बस से शहर के अस्पताल को निकल पडे। गांव से 130 किलोमीटर की दूरी पर सबसे नजदीक शहर उदयपुर के सरकारी महाराणा भोपाल अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने भी कहा कि बच्चे के बचने की उम्मीद कम ही है।
सातवें महीने में ही पैदा होने के कारण शिशु की प्रतिरोधक क्षमताएं अविकसित थीं और वो जीवाणु जनित संक्रमण का भी शिकार था जो उसकी मौत की वजह बन सकता था। डॉक्टरों ने बच्चे को एंटीबॉयोटिक दवाईयों पर तो रखा था लेकिन समस्या स्तनपान को लेकर आ रही थी।
तनावग्रस्त और चिंतित मीणा को पर्याप्त दूध नहीं हो रहा था जबकि बच्चे के स्वास्थ्य के लिए जरूरी था कि उसे संतुलित मात्रा में हॉरमोन युक्त मां का दूध दिया जाए।
'तरल सोना'
भगवान का शुक्र था कि स्तन-दूध की समस्या जल्द ही हल हो गई। उत्तर भारत में पहली बार 'स्तन-दूध बैंक' चला रही गैर-सरकारी संस्था मदद के लिए सामने खडी थी।
अस्पताल के कैंपस में ही अप्रैल 2013 से आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित एक छोटे से क्लिनिक में स्तन दूध का यह बैंक चलाया जा रहा है जिसे विशेषज्ञ 'तरल सोना' कह रहे हैं।
बैंक आसपास की महिलाओं का एचआईवी और हेपटॉईटिस जैसे कुछ रोगों का पूर्व परीक्षण करने के बाद उनका अतिरिक्त दूध एकत्रित करता है। इक्कठा किए गए इस दूध को पॉश्चरीकृत कर जमा दिया जाता है जिसका चार महीने तक उपयोग किया जा सकता है।
बैंक के कर्मचारी हाल में मां बनने वाली महिलाओं को अपना अतिरिक्त दूध जमा करने के लिए कहते हैं ताकि वो दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित कर सकें। दूध बैंक खुलने के समय से ही लगभग 200 महिलाएं सप्ताह में कम से कम एक बार अपना अतिरिक्त दूध दान करती हैं।
उदयपुर के सरकारी अस्पताल के नवजात गहन कक्ष में रखे गये मीणा के बच्चे की तरह ही 700 से अधिक बच्चे बैंक के दूध का सेवन कर स्वास्थ्य लाभ कर चुके हैं। मीणा के बेटे को भी पहली बार ट्यूब के जरिए बैंक का दूध दिया गया।
छह दिन बाद मीणा के पति ने कहा कि बच्चे के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार हो रहा है। नवजातों के लिए इसे 'सुपर फूड' कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
शिशु मृत्युदर
भारत में शिशु मृत्यु दर कम करने के रास्ते में आ रही तमाम कठिनाईयों के बावजूद वर्ष 2001 में हुई पांच साल से कम उम्र के 25 लाख शिशु मौतों की तुलना में 2012 में आंकडा सिर्फ 15 लाख रहा। भारत फिर भी विश्व की कुल शिशु मृत्यु दर में 20 प्रतिशत भागीदारी रखता है।
डॉक्टरों का कहना है कि भारत में शिशु मौतों का मुख्य कारण संक्रमण और कम वजन के बच्चों का पैदा होना है जिसकी वजह से जन्म का पहला ही महीना मीणा के बेटे के तरह उन पर भारी होता है। बाद में ऐसे बच्चों में डॉयरिया और न्यूमोनिया फैलने का भी खतरा रहता है।
स्वंयसेवी संस्था 'सेव द चिल्ड्रेन' का कहना है कि शिशु मृत्यु दर कम करने की दिशा में स्तनपान सबसे प्रभावशाली समाधान है, खासकर तब जब पैदा होने के तुरंत बाद से लेकर अगले छह महीने तक उन्हें मां का दूध दिया जाए।
राजस्थान का यह क्लिनिक 'दिव्य मदर मिल्क बैंक' के नाम से जाना जाता है जिसे उदयपुर स्थित एक स्वंयसेवी संस्था चलाती है। इस स्वंयसेवी संस्था ने वर्ष 2005 में महेश आश्रम नाम से शहर के लावारिस बच्चों के लिए अनाथ आश्रम की स्थापना की थी।
योग गुरू देवेन्द्र अग्रवाल जो इस स्वंयसेवी संस्था के प्रमुख हैं, ने पाया कि आश्रम के बच्चों में जिनमें से ज्यादातर लडकियां ही है, कम प्रतिरोधक क्षमता की शिकार हैं। उन्होंने पाया कि इसकी मुख्य वजह इन बच्चियों का स्तनपान से वंचित होना है।
दूध बैंक की कमी
अग्रवाल बताते हैं कि स्तन-दूध बैंक का अधिकतर दूध सरकारी अस्पताल में जीवन-मृत्यु से जूझ रहे नवजातों को दिया जाता है। सीमित आपूर्ति के कारण कई बार आश्रम के बच्चों को दूध नहीं मिल पाता क्योंकि प्राथमिकता नवजातों को दूध उपलब्ध कराने की है।
अग्रवाल बताते हैं कि आश्रम के बच्चों में प्रतिरोधक क्षमता के विकास की समस्याएं हैं जो बाद में भी पूरी की जा सकती हैं।
बैंक के सीईओ डॉक्टर आरके अग्रवाल के मुताबिक भारत में अभी सिर्फ 11 ऐसे स्तन-दूध बैंक हैं जो बीमार और कमजोर बच्चों की मदद कर रहे हैं जबकि यहां हर साल दो करोड 60 लाख बच्चे पैदा होते हैं। अगर ब्रिटेन से तुलना करें तो वहां हर साल मात्र आठ लाख बच्चे पैदा होते हैं और ऐसे मिल्क बैंक की संख्या 17 है।
उदयपुर में इस क्लिनिक के खुलने के कुछ ही महीने बाद इसी तरह का एक क्लिनिक सरकारी सहायता से कोलकाता में खोला गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस कदम का स्वागत किया है लेकिन उनका मानना है कि सरकार को स्तन-दूध बैंकों का जबरदस्त तरीके से विकास करने के लिए आगे आना चाहिए।
डॉक्टर अरमिडा फर्नाडीस, जिन्होंने 1989 में देश का पहला दूध बैंक मुंबई के एक अस्पताल में खोला था, का कहना है कि यह मुश्किल है क्योंकि सरकार मानती है कि इसका बहुत फायदा नहीं होगा।
डॉक्टर अग्रवाल का कहना है कि इस काम में धन कोई समस्या नहीं है क्योंकि ऐसे किसी भी दूध बैंक की स्थापना दस लाख रुपये में की जा सकती है।
ब्राजील की तर्ज पर रणनीति
दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था 'ब्रेस्टफीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया' के केंद्रीय समन्वयक अरुण गुप्ता का मानना है कि ब्राजील की तर्ज पर भारत में स्तनपान को व्यापक रणनीति का हिस्सा बनाकर शिशु मृत्यु दर पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
दक्षिण अमरीकी देश ब्राजील में अभी 250 से अधिक स्तन-दूध बैंक हैं जो विश्व में सबसे ज्यादा है।
इन दूध बैंकों के अलावा ब्राजील में डाकियों को भी प्रशिक्षण दिया जाता है कि वो गर्भवती महिलाओं को स्तनपान से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराएं। साथ ही अग्निशमनकर्मियों को भी महिलाओं का अतिरिक्त दूध एकत्रित करने के काम में लगाया गया है।
इन सब कदमों की वजह से ब्राजील में शिशु मृत्यु दर में 73 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। यूनिसेफ के मुताबिक ब्राजील में पांच साल से कम उम्र की शिशु मृत्यु दर प्रति हजार मात्र 16 रह गई है। भारत में यह आंकडा ब्राजील के मुकाबले लगभग चार गुना अधिक प्रति हजार 61 है।
डॉक्टर गुप्ता के मुताबिक स्तनपान को बढावा देना काफी जटिल काम है। भारत में इस बारे में महिलाओं को प्रेरित करने के लिए प्रशिक्षित सलाहकारों की कमी है। उन्होंने बताया कि प्रति 1000 महिला पर ऐसे एक सलाहकार की जरूरत है।
डॉक्टर अग्रवाल बताते हैं कि उनका सपना बडा है और शायद ये उनके जीवनकाल में पूरा न हो पाए। उनका सपना है कि एक दिन भारत के सभी किराना दुकानों में महिलाओं के दूध का पाउडर भी मिले। वो कहते हैं कि जब जानवरों के दूध का पाउडर बन सकता है तो महिलाओं के दूध का पाउडर क्यों नहीं तैयार किया जा सकता?