महिलाओं के स्मार्टफोन उपयोग पर बैन के मामले में मानवाधिकार आयोग सख्त
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हाल ही में चौधरी समाज की एक बैठक में कथित रूप से महिलाओं के स्मार्टफोन उपयोग पर पाबंदी लगाने के मामले ने प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर हलचल मचा दी है। यह बैठक 21 दिसंबर को सुंधामाता पट्टी के गाजीपुरा गांव में आयोजित हुई थी, जिसकी अध्यक्षता समाज के अध्यक्ष सुजनाराम चौधरी ने की थी। बैठक में 14 पट्टियों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में यह निर्णय लिया गया कि 15 गांवों की बहू-बेटियां स्मार्टफोन का उपयोग नहीं करेंगी और केवल साधारण कीपैड फोन ही रख सकेंगी, साथ ही सार्वजनिक कार्यक्रमों या पड़ोस में जाने के दौरान स्मार्टफोन ले जाने पर भी रोक लगाई गई थी।
इस फैसले के सामने आते ही सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण और दकियानूसी करार देते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। विरोध बढ़ने के बाद समाज के पदाधिकारियों ने सफाई दी कि यह निर्णय बच्चों की भलाई को ध्यान में रखकर लिया गया था और बाद में इसे वापस ले लिया गया।
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हालांकि इस बीच पश्चिम बंगाल के नेशनल क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो के मनीष जैन ने 2 जनवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने मामले का संज्ञान लेते हुए जालौर जिला प्रशासन से जवाब-तलब किया। मामले में जिला कलेक्टर डॉ. प्रदीप के. गावंडे को आयोग ने नोटिस जारी किया है, जिसमें 14 दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं।
मानवाधिकार आयोग ने अपने नोटिस में स्पष्ट किया है कि किसी भी पंचायत या सामाजिक समूह को महिलाओं के संचार के साधनों पर रोक लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और तकनीक तक पहुंच महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा और सशक्तिकरण से जुड़ा अहम विषय है। जिला कलेक्टर प्रदीप के. गावंडे ने नोटिस मिलने की पुष्टि करते हुए बताया कि मामले की गहन जांच कर आयोग को समयबद्ध रिपोर्ट भेजी जाएगी। इस प्रकरण के बाद पूरे जिले में चर्चा का माहौल है और सभी की निगाहें अब प्रशासन की रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।