जन-आधारित संरक्षण समूह ‘वी आर अरावली’ ने शनिवार को एक उपग्रह ऑडिट जारी करते हुए दावा किया कि अरावली पर्वतमाला का लगभग एक-तिहाई हिस्सा पारिस्थितिक जोखिम में है। समूह ने पूरे क्षेत्र में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
उपग्रह डेटा और वैज्ञानिक मॉडल पर आधारित अध्ययन
समूह के अनुसार, उपग्रह डेटा और ब्रिस्टल FABDEM बेयर-अर्थ मॉडल का उपयोग कर किए गए स्वतंत्र फॉरेंसिक विश्लेषण में पाया गया कि अरावली की 31.8 प्रतिशत पहाड़ी भूमि की ऊंचाई 100 मीटर से कम है। मौजूदा वर्गीकरण के तहत यह क्षेत्र कानूनी संरक्षण खोने के खतरे में आ सकता है।
सरकारी आकलन से अलग तस्वीर
‘वी आर अरावली’ ने कहा कि प्रभावित क्षेत्र को लेकर सरकार का 0.19 प्रतिशत का आकलन पर्वतमाला की वास्तविक भूवैज्ञानिक स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करता है। समूह का मानना है कि ऊंचाई आधारित वर्गीकरण से अरावली के बड़े हिस्से की अनदेखी हो रही है।
नीति खामी की ओर इशारा
समूह से जुड़े जलवायु वैज्ञानिक और पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ. सुधांशु ने कहा कि यह अध्ययन गंभीर नीति खामी को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को गलत तरीके से बंजर भूमि मान लिया जाता है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से ये क्षेत्र भूजल पुनर्भरण और धूल अवरोधक के रूप में बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनके अनुसार, संरक्षण हटने से उत्तर-पश्चिम भारत में मरुस्थलीकरण और जल संकट तेज हो सकता है।
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जल सुरक्षा और वायु गुणवत्ता पर असर की चेतावनी
समूह ने कहा कि खतरे में आए ये क्षेत्र राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में लगभग 30 करोड़ लोगों की जल सुरक्षा और वायु गुणवत्ता के लिए अहम भूमिका निभाते हैं। यहां खनन होने से थार क्षेत्र से रेगिस्तान के विस्तार, जयपुर और गुरुग्राम जैसे शहरों में भूजल पुनर्भरण में कमी और दिल्ली-एनसीआर में कणीय प्रदूषण बढ़ने की आशंका जताई गई है।
डेटा सार्वजनिक, स्वतंत्र सत्यापन की सुविधा
समूह ने बताया कि ऑडिट से जुड़े इंटरएक्टिव नक्शे और डेटा सार्वजनिक कर दिए गए हैं। सभी कोड ओपन सोर्स जारी किए गए हैं ताकि स्वतंत्र सत्यापन संभव हो सके। अध्ययन के आधार पर समूह ने पूरी अरावली को पूर्ण संरक्षित क्षेत्र घोषित करने, पहाड़ियों और पर्वतों के बीच ऊंचाई आधारित भेद खत्म करने और निर्माण व सजावटी पत्थर के लिए खनन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। साथ ही मौजूदा खनन पट्टों को रद्द करने, चित्तौड़गढ़, नागौर, बूंदी और सवाई माधोपुर जैसे क्षेत्रों को मान्यता प्राप्त अरावली प्रणाली में शामिल करने और क्षतिग्रस्त पहाड़ियों के पुनर्स्थापन की भी मांग की गई है।