केंद्र में यूपीए सरकार के समय जवाहरलाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत 170 करोड़ रुपए की लागत से सीकर रोड और न्यू सांगानेर रोड पर बीआरटीएस कॉरिडोर का निर्माण किया गया था। बीआरटीएस का उद्देश्य शहरी सार्वजनिक परिवहन की बसों के लिए अलग कॉरिडोर उपलब्ध कराना था, ताकि इसमें सफर करने वाले लोग अन्य वाहनों की अपेक्षा अधिक तीव्र गति और कम समय में गंतव्य तक पहुंच सकें लेकिन मॉनिटरिंग के अभाव में इस कॉरिडोर में शहरी परिवहन की बसों के साथ अन्य वाहन भी चलने लग गए और यह व्यवस्था ठप पड़ गई।
दरअसल बीआरटीएस व्यवस्था में पैदल चलने वालों और यात्रियों के लिए ऑफ बोर्ड टिकटिंग की सुविधा, इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनजेमेंट सिस्टम और पूरे सिस्टम के लिए कंट्रोल रूम सुविधाएं विकसित की जानी थी, लेकिन इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया, नतीजतन जिस उद्देश्य को लेकर बीआरटीएस कॉरिडोर बनाया गया था, वह पूरा नहीं हो पाया और अब 170 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट को हटाने की तैयारी की जा रही है।
भोपाल में हटाया, इंदौर में भी तैयारी
जवाहरलाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत देश भर में इस तरह के बीआरटीएस कॉरिडोर तैयार किए गए थे। पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश की बात करें तो इसकी राजधानी भोपाल और इंदौर में भी बीआरटीएस कॉरिडोर बनाए गए थे लेकिन वहां भी यह प्रोजेक्ट पूरी तरह फेल हो गया। इसके बाद भोपाल में बीआरटीएस हटा लिया गया और अब इंदौर में भी इसे हटाने का ऐलान चुका है।
स्थानीय संगठन कर रहे थे हटाने की मांग
वर्ष 2010 में सीकर रोड पर और वर्ष 2015 में अजमेर रोड पर जितना कॉरिडोर बना था, उस पर बसों का संचालन शुरू किया गया था। स्थानीय जन संगठन लंबे समय से इस कॉरिडोर का हटाने की मांग कर रहे हैं। करीब 7.1 किलोमीटर लंबाई में सीकर रोड पर एक्सप्रेस-वे से अम्बाबाड़ी तक और -9 किलोमीटर लंबाई में अजमेर रोड से किसान धर्मकांटा होते हुए न्यू सांगानेर रोड बी-2 बायपास तिराहा तक कॉरिडोर बनाया गया है लेकिन सड़क की जगह घिरने और अन्य वाहन के लिए कम स्थान उपलब्ध होने के चलते इस सिस्टम की आलोचना होने लगी। इसके बाद 20 अगस्त 2009 को राज्य सरकार ने फैसला किया कि 45 मीटर से अधिक चौड़ी सड़क पर ही बीआरटीएस कॉरिडोर बनाया जाएगा।
मौजूदा सरकार में केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संगठन (सीआरआरआई) से बीआरटीएस को लेकर स्टडी कराई गई। सीआरआरआई ने जो स्टडी रिपोर्ट जेडीए को सौंपी, उसमें कहा गया है कि या तो मौजूदा कॉरिडोर को हटा दिया जाए या फिर इस सिस्टम को पूरी तरह से लागू किया जाए। इसके बाद जेडीए आयुक्त आनंदी की अध्यक्षता में जेडीए की कार्यकारी समिति की बैठक में इस कॉरिडोर को हटाने का फैसला किया गया है।