राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (रोडवेज) को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने रोडवेज को करीब 653 करोड़ रुपये का मुआवजा देने वाले मध्यस्थता अवार्ड को रद्द करने के वाणिज्यिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने मेसर्स भगवती एंटरप्राइजेज की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जब कंपनी ने रोडवेज की एक भी बस में पार्सल परिवहन का काम शुरू नहीं किया और खुद सुरक्षा राशि वापस मांग ली, तो उसे तीन साल के संभावित मुनाफे के आधार पर करोड़ों रुपये का मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही जयपुर की वाणिज्यिक अदालत का 8 नवंबर 2024 का आदेश बरकरार रहा। वाणिज्यिक अदालत ने 18 सितंबर 2011 को मध्यस्थता न्यायाधिकरण की ओर से पारित 653.20 करोड़ रुपये के अवार्ड को निरस्त कर दिया था।
रोडवेज की 4 हजार बसों में पार्सल ढोने का मिला था ठेका
मामला वर्ष 2005 का है। राजस्थान रोडवेज ने अपनी करीब 4 हजार बसों में छोटे व्यावसायिक पार्सल और घरेलू सामान के परिवहन के लिए लाइसेंसधारक नियुक्त करने का टेंडर जारी किया था। इंदौर की कंपनी भगवती एंटरप्राइजेज ने इसमें 6.66 लाख रुपये प्रतिमाह लाइसेंस फीस की सबसे ऊंची बोली लगाई थी।इसके बाद रोडवेज ने 22 फरवरी 2005 को कंपनी को कार्य आदेश जारी किया। लाइसेंस की अवधि 21 मार्च 2005 से 20 मार्च 2008 तक निर्धारित की गई थी। हालांकि, अनुबंध पर हस्ताक्षर के दौरान कंपनी ने कुछ नई शर्तें जोड़ने की कोशिश की। कंपनी अनुबंध की धारा 29 और 30 हटवाना चाहती थी। इन धाराओं के तहत राज्य सरकार, डाक विभाग और रोडवेज के कुछ वाहनों व सामान को पार्सल लाइसेंस से बाहर रखा गया था।
रोडवेज ने कंपनी की ओर से प्रस्तावित बदलाव स्वीकार नहीं किए और निर्धारित प्रारूप में ही समझौता करने को कहा। कंपनी इसके लिए तैयार नहीं हुई। उसने काम शुरू करने के बजाय सुरक्षा राशि वापस मांग ली। इसके बाद रोडवेज ने राशि लौटाकर 16 अप्रैल 2005 को कार्य आदेश निरस्त कर दिया।
कंपनी ने ठोका 2970 करोड़ रुपये का दावा
कार्य आदेश निरस्त होने के बाद भगवती एंटरप्राइजेज ने मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू कर दी। कंपनी ने कुल 2970.56 करोड़ रुपये का दावा पेश किया। इसमें करीब 2968 करोड़ रुपये तीन साल के संभावित मुनाफे के नुकसान के रूप में मांगे गए थे। 18 सितंबर 2011 को मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने कंपनी के पक्ष में 653.20 करोड़ रुपये का अवार्ड पारित किया। इसके साथ ही 10 जनवरी 2010 से 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया। रोडवेज ने इस फैसले को जयपुर की वाणिज्यिक अदालत में चुनौती दी। अदालत ने मध्यस्थता अवार्ड को निरस्त कर दिया। इसके बाद कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
एक दिन भी काम नहीं किया तो तीन साल के मुनाफे का दावा कैसे?
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि टेंडर की शर्त संख्या 21 के मुताबिक अनुबंध की शुरुआती अवधि केवल एक साल थी। इसके बाद दो साल का विस्तार रोडवेज की समीक्षा और निर्णय पर निर्भर था। ऐसे में जब कंपनी ने एक दिन भी काम नहीं किया, तो अगले वर्षों के संभावित मुनाफे के आधार पर इतना बड़ा मुआवजा मांगने का कोई ठोस आधार नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि कंपनी ने अन्य टेंडरों में दूसरी कंपनियों की ओर से लगाई गई बोलियों के आधार पर अपने नुकसान का अनुमान लगाया था। किसी दूसरे बोलीदाता की पेशकश को वास्तविक व्यावसायिक लाभ का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कंपनी ने अपने दावे के समर्थन में न तो खाते पेश किए और न ही कोई व्यावसायिक योजना प्रस्तुत की।
2.40 करोड़ की फीस के मुकाबले 653 करोड़ का मुआवजा
हाईकोर्ट ने मुआवजे की गणना पर सवाल उठाते हुए कहा कि कंपनी को तीन साल की अवधि में कुल करीब 2.40 करोड़ रुपये लाइसेंस फीस देनी थी, जबकि मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने इससे 272 गुना अधिक मुआवजा निर्धारित कर दिया। खंडपीठ ने भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 73 का हवाला देते हुए कहा कि मुआवजे का उद्देश्य वास्तविक नुकसान की भरपाई करना है, न कि किसी पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाना। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भगवती एंटरप्राइजेज की अपील खारिज कर दी और 653.20 करोड़ रुपये के मध्यस्थता अवार्ड को रद्द करने का फैसला बरकरार रखा।