कर्नाटक जीत के बाद कांग्रेस हाईकमान का फोकस अब राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना विधानसभा चुनाव पर आ गया है। राजस्थान में पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने सीएम गहलोत और कांग्रेस पार्टी की नाक में दम कर रखा है। 15 दिन का अल्टीमेटम पीरियड इसी मई महीने के अंत में खत्म हो जाएगा। इसके बाद पायलट और उनके खेमे के कांग्रेस सरकार में मंत्री और पार्टी विधायकों ने पहले ही आंदोलन की घोषणा कर रखी है। इस डैमेज को कंट्रोल करने में अब कांग्रेस हाईकमान मशक्कत करेगी। सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में राहुल गांधी भी शामिल हो सकते हैं। राजस्थान में गहलोत और पायलट खेमे से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचलें तेज हो गई हैं। सचिन पायलट की क्या एक और दौर की समझाइश की जाएगी या पार्टी अब एक्शन लेगी, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
सीएम गहलोत और उनके खेमे के मंत्री-विधायकों को नहीं पायलट पर विश्वास
राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के खिलाफ दोनों के समर्थित नेताओं की बढ़ती बयानबाज़ी से पार्टी में लगातार बिखराव के हालात बन रहे हैं। जिसे चुनाव से पहले तुरंत रोकने को रोकने की जरूरत पार्टी को महसूस हो रही है। वरना सरकार रिपीट करने का सपना अधूरा रह सकता है। इसे लेकर कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व चिंतित तो है, लेकिन अब तक गंभीरता नहीं दिखा पाया है। कर्नाटक के चुनाव में जीत के बाद उसी फॉर्म्युले को राजस्थान में भी लागू करने की कोशिशें पार्टी में चल रही हैं। सचिन पायलट को मनाने के लिए उन्हें फिर से डिप्टी सीएम का पद दिया जा सकता है। उन्हें पीसीसी चीफ़ बनाया जा सकता है या उन्हें इलेक्शन कैंपेनिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया जा सकता है। दूसरी ओर गहलोत खेमे की कोशिश है कि बार-बार बग़ावती तेवर दिखाने वाले सचिन पायलट को बाहर का रास्ता दिखाया जाए, क्योंकि वह जब तक पार्टी में रहेंगे राजस्थान में कांग्रेस सरकार को डैमेज करते रहेंगे। खुद सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्य आरोप लगा चुके हैं कि सचिन पायलट और उनके खेमे के विधायकों ने बीजेपी से करोड़ों रुपए के रखे हैं और राजस्थान में कांग्रेस सरकार गिराने के षड्यंत्र में वह शामिल रहे हैं। ऐसे में उनके हाथ में इलेक्शन कैंपेनिंग कमेटी की कमान देना या पार्टी का प्रदेश में नेतृत्व सौंपना कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लीक करने के बराबर होगा। गहलोत और उनके खेमे को सचिन पायलट पर अब 1 प्रतिशत भी विश्वास नहीं है।
चुनावी माहौल में कांग्रेस नेतृत्व नहीं चाहता लंबे समय तक चले टकराव
सूत्र बताते हैं कि अब कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान के मसले को ज़्यादा लंबे वक्त तक पेंडिंग नहीं रखना चाहता है। इसलिए दिल्ली में AICC मुख्यालय में राजस्थान मसले को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। सचिन पायलट भी दिल्ली लौट गए हैं। प्रदेश प्रभारी सुखविंदर सिंह रंधावा और महासचिव केसी वेणुगोपाल के जरिए सीएम गहलोत अपनी बातें और शर्तें पार्टी नेतृत्व तक पहुंचा रहे हैं, जबकि सचिन पायलट अब आंदोलन और आर पार की लड़ाई के मूड में दिख रहे हैं।
गहलोत-पायलट दोनों के बीच कुर्सी और अविश्वास की लड़ाई को किस तरह कॉर्डिनेशन और कड़े निर्णयों से निपटाया जाएगा, कहना मुश्किल है। पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह और पार्टी के संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल के साथ ही प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, पीसीसी चीफ डोटासरा और तीनों सह प्रभारी रास्ता निकालने की मशक्कत में जुटे हैं। इससे पहले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी कोशिशें कर चुके हैं। बतौर AICC ऑब्जर्वर पूर्व प्रभारी अजय माकन और खुद मलिकार्जुन खरगे भी अपनी कोशिशें कर चुके हैं। लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका।
गहलोत-पायलट क्या चाहते हैं ?
सचिन पायलट यही कह रहे हैं कि तीन साल पहले सोनिया गांधी ने जो कमेटी बनाई थी, उसकी सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए। पायलट केंद्रीय नेतृत्व के सामने 25 सितंबर 2022 की गहलोत खेमे के विधायकों की बगावत और अनुशासनहीनता का मामला उठा रहे हैं। संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल, जलदाय मंत्री डॉ. महेश जोशी और पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ को दिए नोटिस पर एक्शन की मांग उठा रहे हैं। सचिन पायलट पिछली बीजेपी की वसुंधरा सरकार के समय हुए कथित भ्रष्टाचार मामले की जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई करने, पेपर लीक मामले में नेता और बड़े अफसरों पर कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं। 30 मई तक कार्रवाई नहीं होने पर गांव ढाणी तक जाकर आंदोलन की चेतावनी दी गई है।
दूसरी ओर सीएम अशोक गहलोत सचिन पायलट और उनके खेमे के विधायकों पर लगातार आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने अमित शाह से करोड़ों रुपए ले रखे हैं और सरकार गिराने का षडयंत्र किया है । उन्हें वह पैसा वापस लौटाना चाहिए। सीएम गहलोत और उनके खेमे के मंत्री विधायक और प्रभारी रंधावा भी यही कह रहे हैं कि केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के खिलाफ सचिन पायलट आरोप नहीं लगा रहे। संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी कथित घोटाला मामले में भी पायलट को जांच की मांग करनी चाहिए। लेकिन वह ऐसा इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से पायलट की कथित मिलीभगत रही है। राजस्थान में सियासी संकट के वक्त आए ऑडियो टेप कांड में भी गजेंद्र सिंह शेखावत की आवाज बताई गई थी। जिसका एसीबी में मुकदमा भी सरकार ने दर्ज करवाया। गहलोत खेमा सचिन पायलट पर बिल्कुल भी विश्वास करने के मूड में नहीं है। लेकिन कांग्रेस हाईकमान के कारण ही पायलट को लेकर सीएम पर दबाव है। चुनावी साल में बड़े युवा वोट बैंक और गुर्जर समाज के वोटों का नुकसान कांग्रेस नहीं करना चाहती है, जो पायलट के साथ है। यही सीएम गहलोत और उनके खेमे के विधायकों की मजबूरी है कि वो भी चाहते हैं, पायलट पार्टी में शांत रहकर ही काम करते रहें।
तीन साल से कांग्रेस संगठन नहीं बन पाया
राजस्थान में पिछले तीन साल से कांग्रेस पार्टी का संगठन खड़ा नहीं हो पाया है। इसमें भी गहलोत और पायलट खेमे की लड़ाई ही बड़ा कारण रही है। पार्टी हाईकमान इसे लेकर चिंतित और गंभीर है। प्रदेश में बड़े स्तर पर जिला अध्यक्षों का फैसला होना अभी बाकी है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी का भी विस्तार किया जाना है। चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष पद का निर्णय नहीं होने से भी बड़ी चुनौती है।
गहलोत चौथी बार मुख्यमंत्री बनना चाह रहे, पायलट लगा रहे रोड़े
सीएम अशोक गहलोत चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की प्लानिंग के साथ महंगाई राहत कैंप लगाए हुए हैं। सचिन पायलट और उनके खेमे के मंत्री-विधायकों को यह भी आंखों में खटक रहा है। पायलट इस कार्यकाल में मुख्यमंत्री नहीं बन सके। यदि सत्ता वापसी होती है, तो भी कोई गारंटी नहीं दे रहा है कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। सूत्र बताते हैं इसलिए वह लगातार आंदोलन कर कांग्रेस सरकार को डैमेज करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, ताकि सत्ता परिवर्तन होगा और बीजेपी की सरकार आएगी तो पायलट बता पाएंगे कि उनके साथ के बिना कांग्रेस सरकार नहीं आ सकी। इसलिए माना जा रहा है पायलट अगले 5 साल बाद की लड़ाई अभी से लड़ रहे हैं। सचिन पायलट के पास ऑप्शन यह भी बताया है कि वह चुनाव से पहले बीजेपी या कोई अन्य पार्टी जॉइन कर सकते हैं।