2,327 किराया योग्य परिसंपत्तियां
देवस्थान विभाग के अनुसार राजस्थान और राज्य के बाहर मिलाकर विभाग के अधीन कुल 2,327 किराया योग्य परिसंपत्तियां हैं। इनमें 634 आवासीय, 1,649 व्यावसायिक और 44 अन्य श्रेणी की संपत्तियां शामिल हैं। इनमें से 2,126 संपत्तियां किराये पर हैं, जबकि 201 खाली हैं। इनसे विभाग को हर साल करीब 9.23 करोड़ रुपये का निर्धारित किराया प्राप्त होता है। प्रदेश में ही विभाग के अधीन 2,136 किराया योग्य संपत्तियां हैं। इनमें 1,940 आवंटित और 196 खाली हैं। इनसे सालाना 8.92 करोड़ रुपये का किराया मिलता है। सबसे अधिक आय जयपुर संभाग से करीब 3.93 करोड़ रुपये, जोधपुर से 2.02 करोड़ रुपये और उदयपुर से 1.33 करोड़ रुपये प्राप्त होती है।
राजस्थान के बाहर भी संपत्तियां
देवस्थान विभाग की आर्थिक पहुंच राजस्थान तक सीमित नहीं है। विभाग के पास मथुरा, वाराणसी, हरिद्वार, उत्तरकाशी और द्वारका में भी कुल 191 किराया योग्य परिसंपत्तियां हैं। इनमें से 186 किराये पर हैं और इनसे हर साल करीब 31 लाख रुपये का किराया प्राप्त होता है। अकेले मथुरा की संपत्तियों से लगभग 30.73 लाख रुपये की वार्षिक आय होती है।
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खनन लीज से भी आय
मंदिरों की आय केवल किराये तक सीमित नहीं है। विभाग के अधीन मंदिरों की भूमि पर वर्ष 2024-25 में 55 खनन लीज संचालित थीं। कोटा के श्री द्वारिकाधीश मंदिर, उदयपुर के श्री ठाकुरजी श्याम सुंदरजी मंदिर और श्री ऋषभदेवजी मंदिर की भूमि पर संचालित इन लीज से दिसंबर 2025 तक करीब 13 लाख रुपये की आय हुई।
21 हजार से अधिक बहुमूल्य आभूषण
देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार 31 दिसंबर 2024 तक विभाग के अधीन मंदिरों में 21,165 बहुमूल्य आभूषण दर्ज थे। वर्ष 2025 में श्रद्धालुओं द्वारा 59 नए बहुमूल्य आभूषण भेंट किए जाने के बाद इनकी संख्या बढ़कर 21,224 हो गई।
13 हजार से ज्यादा धर्मार्थ ट्रस्ट
राजस्थान में देवस्थान विभाग के अंतर्गत 13 हजार से अधिक धर्मार्थ ट्रस्ट पंजीकृत हैं। इनमें 165 प्रमुख मंदिर ट्रस्ट ऐसे हैं, जिनकी वार्षिक आय एक लाख रुपये से अधिक है। हालांकि कई मंदिरों की आय करोड़ों रुपये तक पहुंच चुकी है। संवलिया सेठ मंदिर की वार्षिक आय पिछले वर्ष 337 करोड़ रुपये रही। इसके अलावा गोविंद देवजी मंदिर, कैलादेवी मंदिर, मेहंदीपुर बालाजी, मोतीडूंगरी गणेश मंदिर, डिग्गी कल्याणजी और अन्य प्रमुख मंदिर भी करोड़ों रुपये के चढ़ावे और आय वाले धार्मिक संस्थानों में शामिल हैं।
प्रमुख मंदिरों की वार्षिक आय
देवस्थान विभाग के अनुसार प्रमुख मंदिरों की वार्षिक आय इस प्रकार है—
- सांवलिया सेठमंदिर : 337 करोड़ रुपये
- गोविंद देवजी मंदिर : 2.33 करोड़ रुपये
- कैलादेवी मंदिर : 1.85 करोड़ रुपये
- मेहंदीपुर बालाजी मंदिर : 1.76 करोड़ रुपये
- मोतीडूंगरी गणेश मंदिर : 1.16 करोड़ रुपये
- द्वारिकाधीश मंदिर (राजसमंद) : 92.78 लाख रुपये
- श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर : 92.33 लाख रुपये
- मथुरानाथजी मंदिर (राजसमंद) : 75.68 लाख रुपये
- चौथ माता मंदिर : 62.95 लाख रुपये
- खाटूश्याम मंदिर : 62.43 लाख रुपये
- शिलामाता मंदिर : 20.68 लाख रुपये
- डिग्गी कल्याणजी मंदिर : 18.70 लाख रुपये
- रणथंभौर गणेश मंदिर : 16.59 लाख रुपये
- ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर : 5.28 लाख रुपये
ये आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में श्रद्धालुओं के दान और अन्य स्रोतों से हर वर्ष बड़ी मात्रा में आर्थिक गतिविधियां संचालित होती हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विनोद शास्त्री, पूर्व कुलपति, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय ने कहा कि यदि मंदिरों की व्यवस्थाओं की जांच की जाए तो लगभग हर मंदिर में कुछ न कुछ अनियमितता सामने आ सकती है। उनका कहना है कि देवस्थान विभाग के मंदिरों में पुजारियों को बेहद कम मानदेय मिलता है, जिससे उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। उनका मानना है कि पुजारियों को सम्मानजनक वेतन मिलना चाहिए।
शास्त्री कौशलेंद्र दास, अध्यक्ष, दर्शन संकाय, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय का कहना है कि मंदिरों की संपत्ति, भूमि पर अतिक्रमण और चढ़ावे के उपयोग को लेकर गंभीर समस्याएं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई जगह मंदिरों की आय का उपयोग धार्मिक कार्यों के बजाय निजी विलासिता में किया जाता है। उन्होंने सरकार से मंदिरों की भूमि, संपत्ति और चढ़ावे की निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करने की मांग की।
वहीं
स्वामी राधवेंद्र दास, युवाचार्य, श्री गलता पीठ का मानना है कि मंदिरों का संचालन परंपरागत रूप से जुड़े लोगों के हाथ में ही रहना चाहिए। उनके अनुसार सरकारी हस्तक्षेप से धार्मिक भावनाओं और परंपराओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति से गलती होती है तो उसे चिन्हित कर कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन सरकारी तंत्र में जवाबदेही का अभाव रहता है।