राजस्थान में 85 हजार स्कूल कमरे जर्जर हैं, जबकि 5 से 6 हजार भवनों को नए सिरे से बनाने की जरूरत है। हाईकोर्ट ने वैकल्पिक व्यवस्था और स्पष्ट कार्ययोजना मांगी है। सरकार ने समस्या समाधान के लिए 20 हजार करोड़ की जरूरत बताई है।
राजस्थान के जर्जर स्कूल भवनों को लेकर हाईकोर्ट में चल रहे मामले में राष्ट्रीय बाल आयोग की ओर से पक्षधर एडवोकेट वागेश कुमार सिंह ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। मामले को लेकर एडवोकेट सिंह ने कहा कि अगस्त 2025 में हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात में अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा है।
एडवोकेट वागेश कुमार सिंह के मुताबिक, पिपलौदी में सात बच्चों की मौत की घटना के बाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार से जवाब मांगा था। सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट के सामने स्वीकार किया था कि राजस्थान में करीब 85 हजार कमरे जर्जर अवस्था में हैं और किसी भी सूरत में उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सरकार ने यह भी माना था कि प्रदेश में करीब 5 से 6 हजार स्कूल भवन ऐसे हैं, जिन्हें पूरी तरह ध्वस्त कर नए भवन बनाना ही एकमात्र विकल्प है।
सिंह ने बताया कि इन आंकड़ों के सामने आने के बाद हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिए थे कि जर्जर भवनों में बच्चों को नहीं बैठाया जाए और उनके लिए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। इसके बावजूद आज भी कई जगह स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट ने सरकार से स्कूल भवनों की मरम्मत और नियमित रखरखाव के लिए विभाग की योजना के बारे में भी पूछा था। उनके अनुसार, यह गंभीर बात है कि सरकार की ओर से स्कूल भवनों की देखरेख और रखरखाव के लिए कोई स्पष्ट और प्रभावी योजना कोर्ट के सामने नहीं रखी गई। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने इस स्थिति को प्रशासनिक विफलता माना है।
वागेश कुमार सिंह के अनुसार, सरकार ने कोर्ट में बताया था कि जर्जर स्कूलों की समस्या से निपटने के लिए करीब 20 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इसके बावजूद राज्य के बजट में केवल 2 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। उन्होंने बताया कि शिक्षा विभाग के सचिव से कोर्ट ने पूछा था कि 20 हजार करोड़ रुपये की जरूरत को कैसे पूरा किया जाएगा। इस पर केंद्र सरकार और भामाशाह कोष से राशि जुटाने की कोशिश की बात कही गई।
सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल बजट आवंटित कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार को निविदा प्रक्रिया, निगरानी और कार्यान्वयन की पूरी योजना भी बतानी होगी। इसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन स्कूलों में काम किया जाएगा और निर्माण या मरम्मत का काम किस तरह पूरा होगा। उनके मुताबिक, अब तक शिक्षा विभाग की ओर से इस संबंध में स्पष्ट जानकारी कोर्ट के सामने नहीं रखी गई है।
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उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट ने करीब दो महीने पहले आदेश दिया था कि नए शैक्षणिक सत्र में जिस स्कूल के पास तकनीकी स्वीकृति नहीं होगी, वहां शैक्षणिक गतिविधियां संचालित नहीं की जा सकेंगी। सरकार ने आदेश की पालना का दावा किया, लेकिन कोर्ट सरकार के शपथपत्र से संतुष्ट नहीं हुआ। सिंह के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि केवल जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से यह प्रमाणपत्र देना कि जिले के सभी स्कूल ठीक हैं, पर्याप्त नहीं है।
सरकार की मंशा को लेकर वागेश कुमार सिंह ने कहा कि सरकार ने अपनी ओर से आंकड़े छिपाए नहीं हैं। सरकार ने कोर्ट में खुद स्वीकार किया कि प्रदेश में 85 हजार कमरे जर्जर हैं और समस्या के समाधान के लिए 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, उन्होंने राजस्थान में शिक्षा व्यवस्था के गिरते स्तर के लिए नौकरशाही की विफलता को जिम्मेदार माना।
बगरू में हुए विवाद पर सिंह ने कहा कि स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश नहीं किया जाना चाहिए। स्कूल की स्थिति देखने के लिए जाने वाले लोगों को पहले अनुमति लेनी चाहिए और अभिभावकों को साथ रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि बगरू जैसी घटना यदि स्कूल परिसर के भीतर हुई होती तो बच्चों को शारीरिक और मानसिक नुकसान पहुंच सकता था।