अक्सर सख्ती और कानून के प्रतीक के रूप में देखी जाने वाली पुलिस का एक संवेदनशील और मानवीय चेहरा उस समय सामने आया, जब मुक्ताप्रसाद नगर थाना पुलिस ने एक 13 वर्षीय दृष्टिहीन बालिका को कथित उत्पीड़न और बंधन से मुक्त कर उसे नई जिंदगी की राह दिखाई।
कैद थी मासूम की दुनिया
एक घर जिसकी चार दीवारों के भीतर खामोशी, डर और बेबसी कैद थी। यहां एक 13 साल की दृष्टिहीन बालिका की दुनिया सीमित होकर रह गई थी। ना बाहर की रोशनी, ना किसी अपने का सहारा, बस एक लंबा और अंतहीन अंधेरा। लेकिन रविवार को इस सन्नाटे को तोड़ती हुई खाकी की दस्तक पहुंची।
सूचना से शुरू हुई कार्रवाई
पुलिस कंट्रोल रूम को मिली एक सूचना ने पूरे मामले को नया मोड़ दिया। जानकारी दी गई कि एक बालिका को घर में बंधक बनाकर रखा गया है और उसके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है।
मौके पर पहुंची पुलिस टीम
थानाधिकारी विजेंद्र शीला के नेतृत्व में एसआई सुरेश भादू और कांस्टेबल रविंद्र जैसे ही मौके पर पहुंचे, वहां का दृश्य देखकर सभी स्तब्ध रह गए। दरवाजा खुलते ही सामने एक डरी-सहमी मासूम खड़ी थी, जो शायद पहली बार महसूस कर रही थी कि अब कोई उसे इस अंधेरे से बाहर निकालने आया है।
सच्चाई ने झकझोरा
पुलिस ने बालिका को सुरक्षित बाहर निकाला और अपने संरक्षण में लिया। बातचीत के दौरान जो बातें सामने आईं, वे दिल दहला देने वाली थीं, घर के भीतर कैद जिंदगी, बाहर जाने की मनाही और लगातार उपेक्षा का दर्द। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए बालिका को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया। वहां से उसे नारी निकेतन भेजने के निर्देश दिए गए, जहां उसे सुरक्षा, देखभाल और एक नई शुरुआत मिल सके।
ये भी पढ़ें-
जयपुर में IMA का प्रदर्शन: RGHS पर हंगामा, डॉ. बंसल की रिहाई नहीं हुई तो वकीलों के इलाज बहिष्कार की चेतावनी
भावुक कर देने वाला पल
इस पूरी घटना का सबसे भावुक पल तब आया, जब सुरक्षित माहौल में पहुंचने के बाद बालिका ने महिला सिपाही सुमन को गले लगा लिया और मासूमियत से कहा, “थैंक यू दीदी।” उसकी धीमी आवाज और आंखों से बहते आंसू बता रहे थे कि यह सिर्फ राहत नहीं, बल्कि विश्वास की वापसी थी।