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भंवरी देवी हत्याकांड: मृत मानकर नौकरी दी, पेंशन देने में क्यों पीछे? वारिसों को पेंशन न मिलने पर हाईकोर्ट सख्त

Sun, 05 Jul 2026 09:28 AM IST
जोधपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जोधपुर

सार

राजस्थान हाईकोर्ट ने एएनएम भंवरी देवी हत्याकांड में वारिसों को पेंशन और सेवा लाभ नहीं मिलने पर नाराजगी जताई है। अदालत ने चिकित्सा सचिव समेत संबंधित अधिकारियों को 18 जुलाई तक आदेश की पालना करने का निर्देश दिया है। 
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राजस्थान हाईकोर्ट - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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राजस्थान के चर्चित एएनएम भंवरी देवी हत्याकांड में हत्या के करीब 15 वर्ष बीत जाने और राजस्थान हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के ढाई वर्ष बाद भी उनके वैध वारिसों को पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ नहीं मिल सके हैं। इस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के सचिव, पेंशन विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों को अंतिम अवसर दिया है।
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जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने एस.बी. रिट अवमानना याचिका संख्या 1202/2025 की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि 18 जुलाई 2026 तक 12 जनवरी 2024 के आदेश की पूर्ण पालना सुनिश्चित की जाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो 21 जुलाई 2026 को चिकित्सा सचिव गायत्री राठौड़, जोधपुर के सीएमएचओ डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत, चिकित्सा निदेशालय के निदेशक (अराजपत्रित) राकेश कुमार शर्मा, पेंशन विभाग के निदेशक, एलआईसी तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा।

हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद नहीं मिला लाभ
भंवरी देवी के पुत्र साहिल पेमावत और उनकी दो बहनों ने अधिवक्ता यशपाल खिलेरी के माध्यम से अवमानना याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 2024 को चिकित्सा विभाग को सभी लंबित सेवा परिलाभ, नियमित पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ और एरियर की गणना कर चार माह के भीतर ब्याज सहित भुगतान करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आदेश के लगभग 30 महीने बाद भी न तो पेंशन शुरू हुई और न ही अन्य सेवा लाभ दिए गए। कई बार समय लेने और पालन रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करने के बाद अदालत ने अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश जारी किए।
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2011 में हुई थी चर्चित हत्या
भंवरी देवी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में एएनएम के पद पर कार्यरत थीं। एक सितंबर 2011 को वह अपनी बेची गई कार की राशि लेने के लिए बिलाड़ा गई थीं, लेकिन वापस नहीं लौटीं। इसके बाद उनके पति अमरचंद ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। मामला बाद में हाईकोर्ट पहुंचा, जहां से जांच सीबीआई को सौंप दी गई।

सीबीआई जांच में सामने आया कि भंवरी देवी की हत्या कर उनके शव के अवशेष इंदिरा गांधी नहर में बहा दिए गए थे। जांच एजेंसी ने तत्कालीन राज्य सरकार के एक कैबिनेट मंत्री, एक विधायक सहित करीब 13 आरोपियों के खिलाफ हत्या समेत विभिन्न धाराओं में आरोप-पत्र दाखिल किया। यह आपराधिक मुकदमा अभी भी विचाराधीन है। मामले में भंवरी देवी के पति अमरचंद को भी भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत सह-अभियुक्त बनाया गया था।

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सरकार के दो फैसलों पर उठे सवाल
याचिका में विभाग के विरोधाभासी रवैये को भी आधार बनाया गया। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, तत्कालीन सीएमएचओ ने 16 जनवरी 2012 को आदेश जारी कर भंवरी देवी को मृत मानते हुए उनकी सेवा समाप्त कर दी थी। इसके बाद 28 फरवरी 2012 को उनके पुत्र साहिल पेमावत को अनुकंपा नियुक्ति भी दे दी गई। हालांकि, जब पेंशन और अन्य सेवा लाभ देने की बारी आई तो विभाग ने यह कहते हुए प्रक्रिया रोक दी कि मृत्यु प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब विभाग स्वयं उन्हें मृत मान चुका है और उसी आधार पर अनुकंपा नियुक्ति भी दी जा चुकी है, तब पेंशन के लिए मृत्यु को नकारना पूरी तरह विरोधाभासी है।

मृत्यु प्रमाण पत्र बना बाधा
वारिसों ने मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कराने के लिए जिला प्रशासन से संपर्क किया। पहले जिला कलेक्टर और फिर अपर कलेक्टर के निर्देश पर मामला पीपाड़ सिटी के तहसीलदार के पास पहुंचा, लेकिन तहसीलदार ने यह कहते हुए प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया कि न तो मृत्यु उनके क्षेत्राधिकार में हुई और न ही अंतिम संस्कार वहां हुआ। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एक ओर सीबीआई हत्या का आरोप-पत्र दाखिल कर चुकी है, जबकि दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर मृत्यु को ही स्वीकार नहीं किया जा रहा।

हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था अधिकार
रिट याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि केवल मृत्यु प्रमाण पत्र के अभाव में किसी मृत कर्मचारी के वैध उत्तराधिकारियों को सेवा परिलाभों से वंचित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने 12 जनवरी 2024 के आदेश में चिकित्सा विभाग को सभी सेवा परिलाभों की गणना कर नियमित पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ और एरियर ब्याज सहित वारिसों को देने का निर्देश दिया था। साथ ही कहा था कि आवश्यकता पड़ने पर विभाग ट्रायल कोर्ट से सर्विस बुक और मृत्यु से जुड़े आवश्यक दस्तावेज प्राप्त कर सकता है।

पति के हिस्से पर अदालत का रुख
सुनवाई के दौरान चिकित्सा विभाग ने तर्क दिया था कि सेवा अभिलेखों में भंवरी देवी के पति नामित (नॉमिनी) हैं और वे हत्या के मामले में सह-अभियुक्त हैं, इसलिए पेंशन जारी नहीं की जा सकती। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि पति के हिस्से से संबंधित लाभ उनके विरुद्ध लंबित आपराधिक मुकदमे के अंतिम परिणाम पर निर्भर करेंगे। यदि वे दोषमुक्त होते हैं, तभी उनके हिस्से पर विचार किया जाएगा। लेकिन इस आधार पर पुत्र और दोनों पुत्रियों जैसे अन्य वैध वारिसों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
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सरकार का जवाब, अदालत की सख्ती
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पेंशन संबंधी प्रस्ताव पेंशन विभाग को भेजा जा चुका है और उसकी स्वीकृति लंबित है। इस पर हाईकोर्ट ने अंतिम अवसर देते हुए 18 जुलाई 2026 तक आदेश की पूर्ण पालना करने के निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि तय समय सीमा तक कार्रवाई नहीं हुई तो 21 जुलाई को संबंधित सभी वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा।
 
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