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Balotra: गिड़ा CHC में नियमों की खुलेआम अनदेखी, सरकारी अस्पताल की आड़ में मरीजों को बेची जा रहीं बाहरी दवाइयां

Sun, 04 Jan 2026 04:08 PM IST
बालोतरा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बालोतरा

सार

Balotra News: बालोतरा के गिड़ा सीएचसी में नियमों की अनदेखी के आरोप सामने आए हैं। मरीजों को सरकारी दवाओं के बजाय निजी मेडिकल से दवाइयां लेने को मजबूर करने, प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना और मिलीभगत की निष्पक्ष जांच की मांग उठी है।
 
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सरकारी अस्पताल के अंदर खुली खिड़की से बिकती हैं दवाइयां
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विस्तार
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राजस्थान प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं, लेकिन बालोतरा जिले के गिड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में सामने आ रहे हालात इन दावों की सच्चाई पर सवाल खड़े कर रहे हैं। यहां नियमों को ताक पर रखकर मरीजों को सरकारी दवाइयों के बजाय निजी मेडिकल से बाहरी दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। आरोप है कि यह पूरा खेल कुछ चिकित्सकों और निजी मेडिकल संचालकों की आपसी मिलीभगत से संचालित हो रहा है।

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अस्पताल परिसर में निजी मेडिकल की ‘खिड़की’ खुलने का आरोप
स्थानीय लोगों और मरीजों के परिजनों का आरोप है कि गिड़ा सीएचसी परिसर के भीतर ही एक निजी मेडिकल की खिड़की खोली गई है, जहां से ओपीडी और अस्पताल में भर्ती मरीजों को दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं। यह सीधे तौर पर सरकारी नियमों का उल्लंघन है, क्योंकि सरकारी अस्पताल परिसर में निजी मेडिकल का संचालन प्रतिबंधित है।

चौंकाने वाली बात यह है कि पूर्व में जिला कलेक्टर द्वारा किए गए निरीक्षण के दौरान इस मेडिकल खिड़की को तत्काल बंद कराने के निर्देश दिए गए थे। बावजूद इसके, आज भी यह खिड़की कथित रूप से खुलेआम संचालित हो रही है, जिससे प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना का भी सवाल खड़ा हो रहा है।
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अस्पताल के कार्मिक ही बन रहे ‘डिलीवरी बॉय’
सूत्रों के अनुसार, मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। आरोप है कि अस्पताल में कार्यरत कुछ कार्मिक मरीजों की पर्चियां लेकर स्वयं उस निजी मेडिकल से दवाइयां लाते हैं और मरीजों को थमा देते हैं। यह न केवल सरकारी सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट होता है कि निजी मेडिकल, कथित निजी अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बीच सीधा तालमेल बना हुआ है।

रेजिडेंस क्वार्टर में इलाज, पर्चियों पर ‘बालाजी मेडिकल और अस्पताल’
अस्पताल समय के बाद चिकित्सकों द्वारा रेजिडेंस क्वार्टर में मरीजों को देखने का मामला भी सामने आया है। आरोप है कि इस दौरान जो पर्चियां मरीजों को दी जाती हैं, उन पर “बालाजी मेडिकल और अस्पताल” लिखा होता है। जबकि गिड़ा क्षेत्र में इस नाम से कोई भी पंजीकृत अस्पताल मौजूद नहीं है। इससे यह संदेह और गहराता है कि सरकारी चिकित्सकों द्वारा निजी हितों के लिए अवैध मेडिकल प्रैक्टिस को न केवल बढ़ावा दिया जा रहा है, बल्कि उसे संरक्षण भी दिया जा रहा है।

यूटीबी चिकित्सकों का कार्यकाल समाप्त, फिर भी जारी इलाज
एक और गंभीर पहलू यह है कि गिड़ा सीएचसी में कार्यरत यूटीबी (UTB) चिकित्सकों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और उनका विस्तार भी नहीं किया गया है। इसके बावजूद वे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बैठकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं और बाहरी दवाइयां लिख रहे हैं। आरोप है कि निजी मेडिकल और कथित निजी अस्पताल को चलाने के लिए सरकारी अस्पताल की आड़ ली जा रही है। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल स्वास्थ्य विभाग के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य और अधिकारों के साथ भी गंभीर खिलवाड़ है।

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मरीजों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य आमजन, खासकर गरीब और ग्रामीण मरीजों को मुफ्त इलाज और दवाइयां उपलब्ध कराना है। लेकिन जब मरीजों को मजबूरन निजी मेडिकल से दवाइयां खरीदनी पड़ें, तो इसका सीधा असर उनकी जेब पर पड़ता है। कई मरीजों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अस्पताल में दवाइयां उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें बाहर से दवा लाने को कहा गया। इस पूरे मामले पर गिड़ा सीएचसी के प्रभारी डॉ. महेंद्र कुमार ने कहा कि अस्पताल परिसर में कोई खिड़की नहीं खुलती है। इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है। पता करवाता हूं।
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जांच की उठी मांग
हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो फिर जिला कलेक्टर के निर्देशों के बावजूद यह पूरा मामला बार-बार सामने क्यों आ रहा है। स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मरीजों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर आमजन का भरोसा और कमजोर होगा।


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