कब कौन जीता
1957 में कांग्रेस के लाला अचिंत राम, 1962 में कांग्रेस के सरदार हुकम सिंह, 1967 में कांग्रेस की मोहिंदर कौर, 1971 में कांग्रेस के सतपाल कपूर, 1977 में अकाली दल के गुरचरन सिंह टोहड़ा, 1980 में कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह, 1984 में अकाली दल के चरनजीत सिंह वालिया, 1989 में आजादी उम्मीदवार के तौर पर अतिंदरपाल सिंह, 1991 में कांग्रेस के संत राम सिंगला, 1996 में अकाली दल के प्रेम सिंह चंदूमाजरा, 1998 में अकाली दल के प्रेम सिंह चंदूमाजरा, फिर लगातार तीन चुनाव में कांग्रेस की परनीत कौर, 2014 में आप के डाॅ. धर्मवीर गांधी यहां से चुनाव जीते थे।
उम्मीदवारों को कहां नफा, कहां नुकसान
पटियाला सीट पर चुनावी समीकरण बदले हैं। कांग्रेस छोड़ने के बाद परनीत कौर भाजपा में हैं। हालांकि, इस बार परनीत के लिए जीत की राह पहले के मुकाबले चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ उन्हें चुनाव प्रचार के दौरान सभी विस हलकों में किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उधर टकसाली भाजपाई भी परनीत के चुनाव प्रचार से गायब हैं, जो उन्हें टिकट मिलने से नाराज हैं। पूर्व कैप्टन सरकार की ओर से अपने चुनावी वादों पर खरा न उतरने का गुस्सा भी अब तक लोगों में है, लेकिन परनीत कौर का पटियाला के लोगों में खासा प्रभाव है, जिसका उन्हें लाभ मिल सकता है।
कांग्रेस के डॉ. धर्मवीर गांधी ह्रदय रोग विशेषज्ञ हैं और साफ-सुथरी शख्सियत के नेता माने जाते हैं। उनका शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ गांवों के लोगों में राजनेता के साथ-साथ एक डाॅक्टर के खासा प्रभाव है, लेकिन अपनों का विरोध उनके चुनाव प्रचार पर असर डाल सकता है। भाजपा से गठजोड़़ की संभावनाएं खत्म होने के बाद अकाली दल ने यहां से हिंदू चेहरा एनके शर्मा को टिकट दी है। डेराबस्सी के पूर्व विधायक शर्मा को पटियाला के लोग ज्यादा नहीं जानते हैं। हालांकि, पार्टी के आदेशों पर वह पिछले कुछ समय से पटियाला में सक्रिय थे। शर्मा के जरिये अकाली दल की हिंदू वोट बैंक भुनाने की कोशिश रहेगी। आप के डाॅ. बलबीर सिंह पटियाला देहाती हलके से विधायक हैं। 2020 के दिल्ली मोर्चे में डाॅ. बलबीर ने लंगर लगाया था और मुफ्त मेडिकल कैंप भी लगाए थे। कैबिनेट मंत्री डाॅ. बलबीर सिंह एक मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।