जीरकपुर। पटियाला चौक से कोहिनूर ढाबे तक फ्लाईओवर के नीचे एक बार फिर मजदूर परिवारों ने डेरा जमा लिया है। करीब दस परिवार अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं। इन बच्चों की उम्र तीन से आठ वर्ष के बीच है। माता-पिता मजदूरी और कचरा बीनने का काम करते हैं, जबकि बच्चे दिनभर हाईवे किनारे इधर-उधर घूमते रहते हैं। हाईवे के पास रहना इन मासूमों के लिए बड़ा खतरा बन गया है। कई बार बच्चे राहगीरों और डोनेटरों से पैसे, कपड़े या खाना लेने के लिए गाड़ियों की ओर दौड़ पड़ते हैं। स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि माता-पिता काम पर चले जाते हैं तो बच्चों की देखरेख करने वाला कोई नहीं होता। ऐसे में हादसे की आशंका बनी रहती है।
विकलांग मां का सहारा बना आठ साल का बेटा
एक महिला राधिका अपने आठ वर्षीय बेटे राजा के साथ यहां रह रही है। वह विकलांग है, उसके पति कई महीनों से लापता हैं। पति की काफी तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। परिवार का पूरा बोझ छोटे से राजा पर आ गया है, जो कचरा बीनकर किसी तरह पेट भरने की कोशिश करता है। राधिका बताती हैं कि शहर में तीन हजार रुपये से कम किराए पर कमरा नहीं मिलता, इसलिए मजबूरी में फ्लाईओवर के नीचे रहना पड़ रहा है।
काम की तलाश में आए, पर ठिकाना नहीं
मध्यप्रदेश के दमोह से आए राभक्त अपनी पत्नी सखी और चार बच्चों के साथ एक सप्ताह से यहां रह रहे हैं। वे काम की तलाश में जीरकपुर पहुंचे, लेकिन अब तक रोजगार नहीं मिला। उनका कहना है कि आमदनी के बिना किराए का कमरा लेना संभव नहीं है। महिला अनीता ने बताया कि उनके चार छोटे बच्चे हैं। पति शराब पीते हैं और घर की जिम्मेदारी नहीं निभाते। बच्चों को अकेला छोड़कर काम पर जाना भी मुश्किल है।
फ्लाईओवर के नीचे रह रहे ये परिवार गरीबी की मार झेल रहे हैं। प्रशासन और समाज सेवी संस्थाओं की मदद के बिना इन मासूमों की जिंदगी लगातार खतरे में बनी हुई है। शासन-प्रसाशन को जिम्मेदारी के साथ प्रवासियों को एक ठिकाना देना चाहिए। फ्लाईओवर के नीचे रहने वाले अधिकतर परिवारों के पास कमाई का कोई जरिया नहीं है। मासूम बच्चों के साथ खुले में रह रहे हैं। बच्चे हाईवे पर भी घूमते हैं। कोई हादसा भी हो सकता है। - सतपाल ढांडा, समाजसेवी जीरकपुर
फ्लाईओवर के नीचे दोनों तरफ से जाली लगाने का काम चल रहा है, जल्द ही सभी मजदूरों को वहां से हटवा दिया जाएगा। - मनोज कुमार, सेनेटरी इंस्पेक्टर, नगर परिषद, जीरकपुर