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श्रमिक महिला बोली... मैं एक मां हूं, खुद भूखी रह लेती पर बच्चे को कैसे भूखा रखूं

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जीरकपुर। रविवार को दिन के 11 बजे थे। अचानक एक महिला घर से निकली और रेल की पटरी के बीच मरने के लिए लेट गईं। क्योंकि उसे भूख ने अंदर से बहुत कमजोर बना दिया था। उसकी हिम्मत जवाब दे गई थी। तभी उसके पीछे उसका छोटा बेटा भी दौड़ते हुए आ गया। बेटा छोटा जरूर है, पर मां की पीड़ा वह अच्छे से समझ रहा था कि मां क्यों ट्रेन के नीचे आकर मरना चाहती है। क्योंकि उसने अपनी मां को रात के अंधेरे में छुपकर रोते हुए देखा था कि कैसे उसकी मां उसका पेट भरने के लिए पिछले कईं रातों से भूखी सो रही है। अब तो भूख की भी इंतहा भी हो गई थी, भूख नहीं सह पाई तो शायद रेल की पटरी पर आज मरने चली आई....।
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इतने में ट्रेन की सिटी मासूम के कानों तक गई और वह बाहर देखने आ गया और रेल की पटरी के बीच लेटी अपनी मां को देखा तो उसे बचाने के लिए जोर-जोर से शोर मचाने लगा। बच्चे की आवाज सुनकर नजदीक से गुजर रहा कोई राहगीर दौड़कर रेल पटरी के पास पहुंचा और महिला और बच्चे को वहां से हटाकर किनारे ले आया। गनीमत रही कि ट्रेन महिला से थोड़ी दूरी पर ही थी। नहीं तो आज भूख के कारण एक श्रमिक महिला अपनी जान गवां देती..।
आजकल चल रहे हालात के दौरान सिर्फ ये एक श्रमिक महिला की ही कहानी नहीं है, कोरोना काल में पूरे ट्राइसिटी में हजारों श्रमिक महिलाएं हैं, जो लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा कर अपनी गुजर बसर करती थी, लेकिन कोरोना काल के चलते अब वे बेरोजगार हैं। लोग उन्हें अपने घरों में काम के लिए नहीं बुला रहे। उनके पास खाने तक के पैसे नहीं हैं। वे अपने प्रदेश भी कैसे लौटे।
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यह भी बड़ी मजबूरी
अब बात आती है ट्रेेन से अपने प्रदेश जाने के लिए होने वाले ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की, तो वे इतनी पढ़ी लिखी नहीं हैं कि ऑनलाइन घर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन कर सकें। इसके लिए मदद की आस लगाएं हैं और लगातार सिस्टम की तरफ देख रही हैं। ऐसी ही महिलाओं की लॉकडाउन में अमर उजाला ने की पड़ताल.......।
लॉकडाउन के कारण काम नहीं मिलने से दुखी हो चुके श्रमिक
केस नंबर-1
यूपी की रहने वाली श्रमिक सुमन रविवार को आर्थिक तंगी से परेशान होकर मरने के लिए ढकोली में रेल की पटरी पर लेट गई थी। उसके छोटे बेटे अभिषेक ने राहगीरों की मदद से अपनी मां को बचाया। किसी तरह लोगों ने समझाकर मां और बेटे को घर भेजा। दरअसल सुमन लोगों के घरों में काम करती है। लेकिन लॉकडाउन के बाद काम बंद पड़ा है। घर में राशन के लिए पैसे तक नहीं हैं। दो-चार सौ रुपये बचे थे, तो वो चोरी हो गए। उधार कोई दुकानदार देता नहीं है। इसलिए सुमन ने यह कदम उठाया था। सुमन के बेटे अभिषेक ने बताया कि उसकी मां बहुत परेशान है।
केस नंबर-2
मेरी गर्भवती पत्नी की प्रसव की तारीख नजदीक, मैं खुद बीमार हूं, बच्चों के साथ पत्नी को कैसे संभालूं... कोरोना काल में तीन दिन भूखे रहने के बाद 7 माह की गर्भवती महिला और उसके बीमार पति ने सोचा कि अब अपने घर लौट चलें। यहां जो कमाया सब गवां दिया। एक जान बची है, समय रहते घर पहुंच गए तो बच जाएगी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, जिसने लाकर दोबारा वहीं खड़ा कर दिया है। जहां से तीन दिन पहले चले थे। ये कहना है यूपी के हरदोई निवासी कल्लू और उसकी पत्नी कृतिमा का। वह रोजगार की तलाश में 4 माह पहले यूपी से पंजाब के जीरकपुर में आए थे। यहां आकर अपनी पत्नी और ढाई साल के बेटे के साथ रहने लगा। कंस्ट्रक्शन का काम भी मिल गया। दिन अच्छे गुजरने लगे। तभी अचानक कल्लू की तबीयत खराब हो गई और उसे यूरिन पास होने में दिक्कत होने लगी। उसके बाद कृतिमा ने डॉक्टर को दिखाया तो उसका ऑपरेशन हुआ। तब से वह बेड पर था, अब धीरे-धीरे चलने लगा था, कि अचानक लॉकडाउन से काम ठप हो गए। इस पर गांव निकलने की सोची तो कोई साधन नहीं मिला। कुछ दिन फ्लाइओवर के नीचे रातें गुजारी। यहां किसी ने कहा पुलिस डंडे मारेगी। फिर कल्लू ने एक तिरपाल से एक खाली प्लाट में रहने की जगह बनाकर गर्भवती पत्नी, ढाई साल के बेटे के साथ रहने लगा। लेकिन आंधी में तिरपाल उड़ गई तो परिवार के साथ पूरी रात एक दुकान के बारमदे में काटी। बारिश थमने पर परिवार के साथ पैदल ही निकल पड़ा। दो दिन लगातार पैदल चलने के बाद झरमड़ी के पास हरियाणा बार्डर से पुलिस ने आगे नहीं जाने दिया और वापस लौटा दिया। यहां पर उसके जैसे करीब 37 दूसरे लोगों को भी वापस जीरकपुर लौटा दिया गया। अब वह अपने परिवार के साथ जीरकपुर के एक खाली प्लॉट में दिन काट रहा है। इस उम्मीद में कि उसने किसी की मदद से हरदोई के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवाया था और प्रशासन उसे हरदोई भेज देेेगा, लेकिन आज तक उसके पास कोई मैसेज या कॉल नहीं आई।
आंसू लिए महिला बोली- दिहाड़ी के लिए आई थी, अब खाने के भी लाले पड़े
अमर उजाला की टीम जैसे ही जीरकपुर के पीरमुछल्ला में पहुंची। वहां झुग्गियों में रहने वाले लोग घर के बाहर निकल आए। एक महिला दौड़ी हुई आई और बोली साहब आप एसडीएम ऑफिस से आए हो... क्या राशन देेने आए हो क्या। उसे बताया कि मीडिया कर्मी हैं, आपका हाल जानने आए थे, तो महिला रोने लगी। उसने अपना नाम रोशनी बताते हुए कहा कि हम दिहाड़ी की तलाश में उत्तर प्रदेश के हरदोई से लॉकडाउन के दो दिन पहले पंजाब के जीरकपुर पहुंचे थे। उस समय मेरे पास थोड़े पैसे थे। सोचा था कि यहां दिहाड़ी करके पैसे कमा लूंगी। लेकिन लॉकडाउन ने भूखों मार दिया। चार-पांच दिन लोगों ने राशन दिया तो खाना खा पाए। लेकिन अब खाने की समस्या है। मैंने एसडीएम को फोन किया था तो उन्होंने मुझसे पता पूछा था कि राशन पहुंचाएंगे, लेकिन कोई आया नहीं।
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