फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पेंशन पाने के लिए दिव्यांग फौजी ने 52 साल लड़ी लड़ाई, 1968 में ट्रेनिंग के दौरान चली गई थी आंखों की रोशनी

विज्ञापन
विज्ञापन
मोहाली। भारतीय सेेना में दो साल चार महीने नौकरी करने वाले दिव्यांग फौजी (दृष्टिहीन) को 52 साल की लंबी जंग के बाद अपनी पेंशन मिल पाई है। फौजी की सौ फीसदी दिव्यांगता पेंशन खाते में आनी शुरू हो गई है। इस लड़ाई में एक्स सर्विसमैन ग्रीवांसेस सेल का अहम योगदान रहा है।
विज्ञापन

शुक्रवार को फेज-दस स्थित सैनिक सदन में सेल के प्रधान सेवानिवृत्त कर्नल सोही ने इसके बारे में विस्तार से बताया। उनके मुताबिक, भूपिंदर सिंह 16 सिख रेजिमेंट में 1968 में भर्ती हुए थे। झांसी में ट्रेनिंग के दौरान वह सिर के बल गिर गए, जिसके बाद धीरे-धीरे उनकी आंखों की रोशनी कम हो गई। कुछ दिनों में दिखना बंद हो गया। इसके बाद 1970 में दो साल चार महीने की नौकरी के बाद सेना ने अनफिट घोषित कर नौकरी से जवाब दे दिया। ग्वालियर में उनका इलाज चला, आखिर में फौज ने चालीस फीसदी दिव्यांगता पेशंन के साथ घर भेज दिया। हालांकि बाद में उनके पेंशन केस को ही रद्द कर दिया गया। इसका पता चलते ही कर्नल सोही ने साल 2014 में आर्मी ट्रिब्यूनल चंडीगढ़ में केस दायर किया। 2018 में महिंदर सिंह को चालीस फीसदी दिव्यांगता पेंशन देने का फैसला हुआ। इसके बावजूद आर्मी हेडक्वार्टर के लीगल विभाग ने इस फैसले के खिलाफ जंग जारी रखी।
पहले से चालीस देने से हटे फिर सौ फीसदी देनी पड़ी
कर्नल सोही ने बताया कि जब आर्मी ट्रिब्यूनल का फैसला लागू नहीं हुआ तो उन्होंने अदालत में एक और याचिका दायर की। उन्होंने अदालत को बताया कि महिंदर सिंह को चालीस फीसदी दिव्यांगता पेंशन देने का फैसला हुआ है। साथ ही दो साल से रिव्यू मेडिकल बोर्ड का फैसला भी जून 2019 से लंबित चल रहा है। इस मामले को उन्होंने भारतीय सेना प्रमुख के सामने उठाया। 21 फरवरी 2020 को रिव्यू मेडिकल बोर्ड गठित किया गया, जहां दिव्यांगता पेंशन चालीस फीसदी से बढ़ाकर सौ फीसदी कर दी गई।
विज्ञापन

हर महीने 33 हजार मिलेंगे, पांच लाख बकाया मिला
पूर्व फौजी को अब हर महीने 33 हजार पांच सौ रुपये पेंशन मिल रही है। इसमें 6700 रुपये अटेंडेंट के भी पैसे दिए जा रहे हैं। साथ ही पांच लाख रुपया पुराना बकाया मिला है। कर्नल सोही ने बताया कि पूर्व फौजी के मामले में इतनी देरी की वजह आर्मी लीगल सेल है, जो कि बिना किसी कारण से फौजियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाता है। उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार के तहत आठ करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। कर्नल सोही ने बताया कि आर्मी ट्रिब्यूनल में जजों की बहुत कमी है। 17 आर्मी ट्रिब्यूनल में सिर्फ दो जज हैं। उन्होंने मांग की है कि इनकी संख्या पूरी की जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें