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अब शहर के स्पोर्ट्स कांप्लेक्स नगर निगम व खेल विभाग चलाएंगे

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मोहाली। शहर के खिलाड़ियों को अब खेलने के लिए चंडीगढ़ या निजी अकादमियों में नहीं जाना पड़ेगा। इसके अलावा उनके परिजनों को मोटी कोचिंग फीसों से भी कुछ राहत मिलेगी। अगर सबकुछ सही रहा तो आने वाले समय में इलाके के स्पोर्ट्स कांप्लेक्स को नगर निगम व खेल विभाग मिलकर चलाएंगे। इसके लिए सारी रणनीति तैयार की जा रही है। विधायक कुलवंत सिंह ने इसकी पुष्टि की।
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उन्होंने बताया कि जिस उद्देश्य के लिए स्टेडियम बनाए गए थे, अब उस उद्देश्य को पूरा किया जाएगा। कोशिश यही है कि लोगों को दिक्कत न उठानी पड़े। गमाडा की तरफ से फेज-11, फेज-नौ, सेक्टर-69, सेक्टर-71, फेज-पांच, सात, सेक्टर-78 में स्टेडियम स्थापित किए गए हैं। इनमें से फेज-नौ और सेक्टर-78 वाला पहले ही खेल विभाग के पास चल रहे हैं जबकि शेष सभी स्टेडियमों को गमाडा ने मरम्मत कर नगर निगम को सौंपने का फैसला लिया था लेकिन आर्थिक तंगी का सामना कर रहा नगर निगम इनकी जिम्मेदारी लेने से पीछे हट गया था क्योंकि स्टेडियम चलाना कोई आसान गेम नहीं है। इसके लिए नगर निगम को विभिन्न गेमों के माहिर कोच, डॉक्टर, फिजियोथेरेपिस्ट व अन्य सहायक स्टाफ रखना पड़ेगा। इसके अलावा अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ेगी। ऐसे में नगर निगम पर हर महीने बीस से तीस लाख का अतिरिक्त बोझ आ सकता था। ऐसे में नगर निगम इस काम से पीछे हट रहा था। अब विधायक खुद इस क्षेत्र में आगे आए हैै। उन्होंने कहा कि सरकार का ध्यान खेलों पर लगा हुआ है। ऐसे में वह अब खेल स्टेडियमों को खेल विभाग और नगर निगम के हवाले करेंगे जिससे पूरे इलाके का फायदा हुआ है। विधायक ने दलील दी कि गमाडा ने कांप्लेक्स बहुत ही शानदार तरीके से बनाए थे लेकिन उचित देखभाल न होने के चक्कर में थोड़ी दिक्कत आई थी। अब उम्मीद है कि अब सारी स्थिति सुधर जाएगी। याद रहे कि स्टेडियम में सारी गेम्स के खेलने की सुविधा है। ऑल वेदर स्वीमिंग पूल से लेकर अन्य इंतजाम हैं। जब गमाडा द्वारा स्टेडियम निजी ठेकेदारों के सहयोग से चलाए गए तो भी प्रयोग कामयाब रहा था।
ऐसे सच हुआ था स्पोर्ट्स स्टेडियम का सपना
2010-2011 में जब अकाली बीजेपी की सरकार थी, उस समय मोहाली में स्पोर्ट्स स्टेडियम न होने का मामला उठा था। लोगों की दलील थी कि मोहाली में बच्चों के लिए खेलने के लिए कोई मैदान या स्पोर्ट्स कांप्लेक्स तक नहीं है। ऐसे में उस समय करीब सात स्टेडियम बनाने का फैसला लिया था। स्टेडियम इस तरह बनाए गए थे कि हरेक फेज या सेक्टर के लोगों को इनका फायदा मिल पाए। जब स्टेडियम तैयार हुए तो गमाडा ने दो स्टेडियम स्पोर्ट्स विभाग को सौंप दिए। वहीं अन्य स्टेडियम प्राइवेट ठेकेदारों को, जिनकी फीस 1800 से 2000 रुपये के बीच में थी। ऐसे में कई युवा जो अच्छी प्रतिभा रखते थे, लेकिन फीस भरने में सक्षम नहीं थे, वे या तो चंडीगढ़ या पंजाब के अन्य जिलों में चले गए या खेलना ही छोड़ दिया।
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