मोहाली। देशभर में भले ही होली रंग, फूल और गुलाल से खेली जाती है, लेकिन चंडीगढ़ जैसे स्मार्ट शहर से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव सोहाना की होली इससे बिल्कुल अलग है। यहां पर होली की सुबह की शुरूआत श्मशान की राख और जानवरों की हड्डियों की सफाई से होती है। पूरे गांव के लोगों के घरों के बाहर गलियों में हड्डियां और राख बिखरी मिलती है। यह सब करता कौन है... इस बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं है। लेकिन वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। पुलिस की ओर से सख्ती भी की जाती है, लेकिन गांव वालों की मानें तो उन्हें भी इसकी आदत सी हो गई है। भले ही इससे गांव में गंदगी फैलती है, फिर भी लोग इस परंपरा को कायम रखे हुए हैं।
जानकारी के मुताबिक एयरपोर्ट रोड के बिल्कुल साथ में गांव सोहाना बसा हुआ है और यह गांव अब नगर निगम के अधीन भी आ चुका है। इसलिए यहां सभी सुविधाएं शहर जैसी ही हैं। गांव पूरी तरह शहर की तर्ज पर बस गया है, फिर भी यहां पर वर्षों से होलिका दहन की रात श्मशान घाट की राख और हड्डी फेंकने की परंपरा चली आ रही है। गांव सोहाना के पूर्व सरपंच एवं पार्षद परविंदर सिंह सोहाना कहते हैं कि यह परंपरा काफी समय से चली आ रही है। यह परंपरा कब से शुरू हुई और ऐसा क्यों किया जाता है, कौन करता है, इस बारे में किसी को कुछ पता नहीं है। उन्होंने बताया कि इसके पीछे कोई कहानी भी नहीं है।
इसी तरह गांव निवासी जगदीप सिंह ने बताया कि यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इसके बारे में आज तक किसी ने कोई जानकारी नहीं दी। न ही इसे बारे में किसी बुजुर्ग से कुछ पता चला है। जब से हमने होश संभाला है, तब से ऐसे ही होता आ रहा है। कभी-कभार बीच में एक दो-साल तक यह परंपरा बंद हो जाती है। लेकिन फिर दोबारा शुरू हो जाती है। उन्होंने बताया कि हमारे गांव में तो होली वाले दिन पहले गली और घरों के बाहर गिरी हड्डियों को हटाया जाता है। इसके बाद ही होली खेली जाती है। गांव का माहौल काफी अच्छा रहता है। गांव के लोग मिलकर होली खेलते हैं। इसके अलावा धार्मिक स्थानों पर जाकर माथा टेकते हैं।
गांव चिल्ला में मुख्य दीवाली से अगले दिन मनाई जाती है दीपावली
मोहाली जिले के अंतर्गत आने वाला एक गांव जिसका नाम ‘चिल्ला’ है, वहां पर ऐसी परंपरा है कि मुख्य दीवाली के अगले दिन ही दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इस गांव में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। जब इसके बारे में स्थानीय ग्रामीणों से बातचीत की गई तो उन्होंने जानकारी दी कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना है कि यह परंपरा उस समय से शुरू हुई थी जब एक बार दीवाली के दिन गांव के लोगों के पशु चरने के लिए गांव से बाहर दूर खेत खलिहानों में गए हुए थे। इस दिन जब देर शाम तक पशु चरने के बाद वापस गांव में नहीं लौटे तो ग्रामीणों को चिंता हो गई। इस पर सभी लोग दीवाली का त्योहार मनाने के बजाय चिंतित होकर अपने पशुओं को ढूंढने कि लिए निकल गए थे। इसके बाद रात भर वह पशुओं को ढूंढते रहे और पशुओं को ढूंढने के बाद सुबह अपने घरों को लौटे थे। इस तरह उन्होंने मुख्य दीवाली के अगले दिन दीवाली का त्योहार मनाया था। इस इसके बाद से वहां परंपरा शुरू हो गई कि मुख्य दीवाली के अगले दिन ही दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।