मोहाली। एक ऐसी बीमारी जो जन्म लेते ही बच्चों की सांसें भारी कर देती है, एक ऐसा इलाज जिसकी कीमत सुनकर परिवार टूट जाते हैं। ऐसे में नाइपर ने दुनिया के सामने उम्मीद की खिड़की खोल दी है। यह कहानी सिर्फ लैब के शोध की नहीं यह उन परिवारों की है जो हर दिन अपने बच्चों की सांसें चलते रहने की दुआ करते हैं। सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए नाइपर का यह शोध एक बड़ी राहत की तरह आया है।
अध्ययन का फोकस उन रोगियों पर था जिनमें सिस्टिक फाइब्रोसिस का सबसे सामान्य जीन उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) पाया जाता है। इस उत्परिवर्तन के कारण शरीर में सीएफटीआर प्रोटीन ठीक से काम नहीं कर पाता, जिससे बीमारी के लक्षण उत्पन्न होते हैं यूरोप में 3500 में से एक मरीज इस बीमारी से जूझ रहा है, जबकि भारत में यह आंकड़ा दस हजार में सिर्फ एक है। इतनी दुर्लभता के कारण बीमारी अक्सर समय पकड़ में नहीं आती है। इसके अलावा इलाज भी बेहद कम उपलब्ध है। दवाइयां इतनी महंगी है कि अधिकतर परिवार नाम सुनते ही पीछे हट जाते हैं। कुछ दवाएं लाखों रुपये की आती है। कई बार परिवारों की साल भर की कमाई से भी ज्यादा।
नाइपर का शोध बनी उम्मीद
प्रो. दीपिका बंसल के नेतृत्व में टीम ने डीएचआर (डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च) भारत सरकार की साझेदारी में पहली बार दुनिया में किए 29 क्लिनिकल ट्रायल्स के डेटा को एक साथ जोड़कर ग्लोबल एविडेंस सिंथेसिस तैयार किया। इससे स्पष्ट हुआ कि वयस्क सिस्टिक फाइब्रोसिस मरीजों के लिए सबसे असरदार दवा संयोजन है। इसके दोनों संयोजन वयस्क मरीजों के लिए सबसे असरदार है। यह निष्कर्ष डॉक्टरों को सिर्फ इलाज चुनने में मदद नहीं करता बल्कि यह सरकार और नीति-निर्माताओं को भी बताता है। इसकी कौन-सी दवाएं भारत में सस्ती और उपलब्ध करवाई जाना ज्यादा जरूरी है।
परिवारों को मिली राहत
यह शोध एम्स दिल्ली और पीजीआई चंडीगढ़ जैसे भारत के सबसे बड़े संस्थानों की साझेदारी से बना है। मरीजों का इलाज, डेटा और सांख्यिकीय पद्धतियों को जोड़कर तैयार इस अध्ययन ने एक ऐसी वैश्विक कमी को भरा है, जो अब तक किसी देश ने नहीं की थी। यह सीधे-सीधे उन हजारों परिवारों की मदद करेगा जो ज्यादा दवा विकल्पों के बीच उलझे रहते थे।