‘थोपी शर्तों पर नहीं दी जाएगी जमीन’
4500 एकड़ जमीन एक्वायर करने के मामले ने पकड़ा तूल
गमाडा के विरोध में उतरे किसानों ने दिया संघर्ष का अल्टीमेटम
कहा, गमाडा कर रहा धक्का, लैंड पूलिंग पॉलिसी उचित नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
मोहाली।
गमाडा की ओर से एक्वायर की जाने की वाली 4500 एकड़ जमीन का मामला गरमा गया है। 12 से अधिक गांवों के किसानों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। उन्होंने विभाग की लैंड पूलिंग पॉलिसी पर एतराज जताया है। किसानों का कहना है कि पहले प्रोजेक्टों के लिए जो जमीन एक्वायर की गई थी, उसका लाभ भी उन्हें अब तक नहीं मिला है। उनका कहना है कि पॉलिसी में संशोधन कर सरकार उनके हक छीनने की कोशिश कर रही है। यह आरोप शनिवार को फेज-4 स्थित प्रेस क्लब मोहाली में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में किसान हित बचाओ कमेटी ने लगाए।
प्रेस कांफ्रेंस में किसान नेता गुरविंदर सिंह ने कहा कि एरोसिटी की जमीन के लिए गमाडा की ओर से कहा जा रहा है कि 70 फीसदी किसान लैंड पुलिंग स्कीम लेने के लिए राजी हैं। जबकि यह पूरी तरह से गलत है। किसानों की मांग है कि लैंड पूलिंग के लिए जो कमेटियां बनाई गई हैं, उसमें उन्हें भी शामिल किया जाए। जमीन किस मूल्य पर अधिगृहीत की जानी है, ये स्पष्ट किया जाए। सरकार की ओर से जो संशोधन किए गए हैं, उन्हें विस्तार से स्पष्ट किया जाए। किसान अमर सिंह ने कहा की गमाडा उनकी 25 एकड़ जमीन पहले ही अन्य प्रोजेक्टों के लिए एक्वायर कर चुका है, लेकिन लैंड पूलिंग पॉलिसी के तहत किए गए वायदे अब तक पूरे नहीं किए गए। इस कारण अपनी जमीन बचाने के लिए उन्हें संघर्ष की राह पर आना पड़ा है। उन्होंने कहा की अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो अपनी जमीन गमाडा को नहीं देंगे। इस दौरान करीब 12 गांवों से आए किसानों का कहना है की गमाडा अधिकारियों द्वारा बंद कमरों में पॉलिसी तैयार कर उन्हें गुमराह किया जा रहा है। किसानों ने कहा कि किसी हाल में थोपी शर्तों पर जमीन नहीं दी जाएगी। उन्होंने सरकार को संघर्ष का अल्टीमेटम भी दिया है।
पहले इन प्रोजेक्टों के लिए लैंड पूलिंग दी गई
इससे पहले गमाडा ने एयरोसिटी, आईटी सिटी, इकोसिटी और मेडिसिटी के लिए जमीन एक्वायर की थी। इस दौरान किसानों को लैंड पूलिंग और नकदी दोनों विकल्प दिए गए थे। इस दौरान जिन्होंने नकद भुगतान लिया था, उन्हेें डेढ़ करोड़ रुपये दिए गए। लैंड पूलिंग विकल्प के तहत रिहायशी व कॉमर्शियल प्लॉट दिया जाता है। जब तक उक्त एरिया विकसित नहीं हो जाता है। तब तक उसका ठेका किसानों को दिया जाता है।