फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

धरती दा जहरी हो गया पानी स्पेशल न्यूज

विज्ञापन
विज्ञापन
- सतलुज और घग्गर अब नहीं हैं जीवनदायनी
विज्ञापन

- किसी को भी कैंसर का मरीज बनाने के लिए काफी है इन नदियों का पानी
- सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथारिटी सिंचाई लायक भी नहीं मानती यहां के पानी को
- एनजीटी की निगरान कमेटी के मेंबर संत सीचेवाल ने सरकारों को ठहराया जिम्मेदार

नवनीत छिब्बर
मोहाली। सतलुज और घग्गर में अब खुशहाली का पानी नहीं मौत का जहर घुल रहा है। नदियों के मीठे साफ जल के कारण पुरातन संस्कृतियों की जन्मदाता रही पंजाब-हरियाणा की धरती पर नदियों व नहरों में पानी अब बीमारियों की सौगात बांट रहा है। यह कोई सियासी बयानबाजी नहीं है, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दोनों राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों व सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथारिटी की रिपोर्ट्स यह खुलासा करती हैं। इन नदियों का पानी पीने लायक तो छड़िए सिंचाई तक के काबिल नहीं बचा है।
बात सतलुज की करें तो जालंधर, फगवाड़ा, लुधियाना से लेकर हरिके तक इसकी स्थिति भयानक रूप ले चुकी है। बुड्ढा नाला, चिट्टी बेईं, काला सांगा ड्रेन, जालंधर का जमशेद ड्रेन और फगवाड़ा ड्रेन से आ रहा इंडस्ट्रियल वेस्ट वाटर सतलुज के पानी को पूरी तरह जहरीला कर चुका है। हालांकि सरकार और पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कई बड़े खर्च वाली परियोजनाओं के जरिए इसे नियंत्रित करने के दावे कर रहा है, लेकिन उसकी अपनी ही रिपोर्ट यहां के पानी को जहरीला साबित करती है। सतलुज में क्रोमियम और निकल की मात्रा इतनी अधिक है जो किसी को भी आसानी से कैंसर का मरीज बनाने के लिए पर्याप्त है।
विज्ञापन

घग्गर की बात करें तो पंजाब से लेकर राजस्थान तक यह प्रदूषण के चलते बीमारियां बांटने का मुख्य कारण बनी हुई है। मुबारकपुर क्षेत्र में घग्गर के पानी में बीओडी यानि बॉयलॉजिक्ल ऑक्सीजन डिमांड की मात्रा सर्वाधिक पाई गई है। सिरसा-डबवाली के बीच इसमें टीडीएस यानि टोटल डिसॉल्वड सॉलिड की मात्रा सबसे ज्यादा पाई जाती है। चंद्रपुर-सिपोह क्षेत्र में इसके पानी में टीसी यानि टोटल कॉलिफार्म की मात्रा ज्यादा है। इसी तरह राजस्थान के हनुमानगढ़ और हरियाणा के ओतुवेर में भी घग्गर का पानी सिंचाई लायक भी नहीं बचा है।
अगर भूमिगत जल की बात करें तो पांच दरियाओं की धरती पंजाब में इसकी हालत भी चिंताजनक बनी हुई है। पंजाब के दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र में भूमिगत पानी में नाइट्रेट की मात्रा 100 मिलीग्राम प्रति लीटर है। इस क्षेत्र के 14 फीसदी ट्यूबवेल का पानी सिंचाई के इस्तेमाल लायक भी नहीं बचा है। यहां फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से काफी ज्यादा है। डब्ल्यूएचओ के मानकों के मुताबिक पानी में नाइट्रेट की मात्रा 50 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसी तरह पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिकतम 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तक होनी चाहिए।
मालवा क्षेत्र में की गई सैंपलिंग में फ्लोराइड, इलेक्ट्रिकल कंडेक्टिविटी और नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित मानक से ज्यादा पाई गई है। यहां का पानी सोडियम का अनुपात ज्यादा होने के कारण खेतीबाड़ी में इस्तेमाल करने के लायक भी नहीं बचा है। नवांशहर और होशियारपुर क्षेत्र के पानी में सेलेनियम की मात्रा सेहत के लिए हानिकारक स्तर तक पहुंच चुकी है। मुक्तसर, बठिंडा, मानसा, फिरोजपुर, संगरूर और मोगा के पानी को तेजाबी बताते हुए सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथारिटी ने अपनी रिपोर्ट में न पीने योग्य करार दिया है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नेटवर्क स्थापित किया
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश भर में जलीय संसाधनों की गुणवत्ता पर निगरानी के लिए एक नेटवर्क स्थापित किया है। इस नेटवर्क के तहत 28 राज्यों और 6 केंद्र शासित क्षेत्रों में 2500 स्टेशन स्थापित किए गए हैं। देश भर में स्थापित यह मॉनिटरिंग नेटवर्क 445 नदियों, 154 झीलों, 12 जलाशयों, 78 तालाब, 41 समुद्री खाड़ियों, 25 नहरों, 45 बरसाती अथवा प्राकृतिक नालों, 10 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट्स और 807 कुओं को कवर करते हैं।

क्या है एनडब्ल्यूएमपी
एनडब्ल्यूएमपी यानि नेशनल वाअर मॉनिटरिंग प्रोग्राम मौजूदा समय में जल गुणवत्ता निगरानी के त्रि-स्तरीय कार्यक्रम को संचालित कर रहा है। जिसमें ग्लोबल एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग सिस्टम, भारतीय राष्ट्रीय जलीय संसाधन प्रणाली और यमुना एक्शन प्लान की निगरानी शामिल है। इन क्षेत्रों में निगरानी के अलावा 9 मुख्य मापदंडों, 19 अन्य भौतिक-रासायनिक और बैक्टीरियोलॉजिकल मापदंडों से युक्त 28 मापदंडों के लिए पानी के नमूनों का विश्लेषण किया जा रहा है। इसके अलावा, चयनित नमूनों में 9 ट्रेस धातु और 15 कीटनाशकों का भी विश्लेषण किया जाता है। खास जगहों पर बायोमोनिटरिंग भी किया जाता है।

एनजीटी का भी है सख्त रुख
घग्गर और सतलुज के प्रदूषण को लेकर एनजीटी ने सख्त रुख अपनाया है। घग्गर नदी में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए हरियाणा पंजाब सहित संबंधित राज्यों को पिछले वर्ष निर्देश जारी किए जा चुके हैं, वहीं प्रदूषण को लेकर पंजाब सरकार पर पिछले दिनों जुर्माना भी लगाया गया था। एनजीटी ने अपने आदेश में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सरकारों की विफलता पर कड़ी टिप्पणी की थी।
एनजीटी ने एक कार्यकारी समिति का गठन भी किया है, जिसमें पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश प्रीतम पाल और सीपीसीबी के एक वैज्ञानिक और पर्यावरण और वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नई दिल्ली के एक वैज्ञानिक शामिल हैं। एनजीटी के सख्त रवैये के बाद हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव और प्रशासनिक सचिवों के साथ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की कई स्तर पर बैठकें हो चुकी हैं, जिसमें सिंचाई, जन स्वास्थ्य, शहरी स्थानीय निकाय, पर्यावरण, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच तालमेल बनाया गया है। जिसके बाद घग्गर को प्रदूषण मुक्त करने की सरकारी कवायद जारी है।

कोट्स
लोगों से छीना जा रहा है राइट टू लिव: सीचेवाल
नेशनल ग्रीन ट्रब्यूनल द्वारा नियुक्त निगरान कमेटी के मेंबर पर्यावरणविद संत बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल ने पंजाब और हरियाणा की सरकारों व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि निजी स्वार्थों की खातिर लोगों से राइट टू लिव यानि जीने का अधिकार भी छीना जा रहा है। उन्होंने कहा कि सतलुज व घग्गर में क्रोमियम और निकल की मात्रा हानिकारक स्तर को भी पार कर चुकी है। इस क्षेत्र में यह कैंसर का मुख्य कारण है। इसका मुख्य कारण इंडस्ट्रियल वेस्ट पर लगाम लगाने में सरकार की नाकामी है। उन्होंने ट्रीटमेंट प्लांट्स की सफलता के दावों को भी सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सरकार बताए कि यदि उसके दावे सही हैं तो फिर पानी में जहर कैसे घुल रहा है। संत बाबा सीचेवाल 16 जनवरी तक जल प्रदूषण पर एक रिपोर्ट एनजीटी को देने जा रहे हैं, जिस पर 22 फरवरी को सुनवाई होगी।
विज्ञापन


वेस्ट मैनेजमेंट में लापरवाही है बड़ा कारण: डॉ. बातिश
अर्थशास्त्री एवं पर्यावरणविद् डॉ. नरेश बातिश के अनुसार भूमिगत व प्राकृतिक जल स्त्रोतों के दूषित होने के पीछे सबसे अहम कारण कचरे का सही ढंग से निस्तारण न किया जाना है। अकेले पंजाब में प्रतिदिन 4200 टन कचरा फेंका जाता है, जिसमें घरेलू वेस्ट से लेकर मेडिकल व केमिकल वेस्ट भी शामिल होता है। जलवायु की नमी और बारिश के पानी के साथ कचरे के घातक तत्व पानी में चले जाते हैं, जिनका शोधन मुश्किल है। सरकार जब तक वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर गंभीर नहीं होगी पानी दूषित होता रहेगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें