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मौसम की करवट : देर रात आंधी और बारिश ने दिलाई गर्मी से राहत

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मोहाली। कई दिन से पड़ रही भीषण गर्मी से आखिर सोमवार देर रात को लोगों को राहत मिल गई। मौसम ने अचानक करवट ली और करीब सवा 11 बजे आंधी शुरू गई। आंधी शुरू होते ही पूरे शहर और गांवों में बिजली गुल हो गई। करीब आधे घंटे बाद पौने 12 बजे तेज बारिश शुरू हो गई। इससे पहले दिन में मोहाली का अधिकतम तापमान 42 डिग्री दर्ज किया गया। प्रचंड तापमान से जनजीवन प्रभावित रहा। वर्ष 2007 से हर साल पिछले साल की तुलना में ज्यादा गर्म साबित होता आ रहा है। नासा सहित तमाम वैज्ञानिक इस खतरे के प्रति आगाह करते आ रहे हैं। इसके बावजूद उपभोक्तावादी प्रवृति स्थिति को भयावह बनाती जा रही है। सप्ताह के पहले दिन भी गर्मी के कहर से त्रस्त शहर सुनसान रहा। गर्मी के चलते डिहाइड्रेशन, इंफेक्शन और बुखार के मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। बढ़ते तापमान की मार फुटकर व्यापारियों के कारोबार पर भी पड़ रही है। मौसम विभाग के अनुसार इस सप्ताह के अंत में पारा 45 डिग्री पार करने की संभावना है।
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धरती के बढ़ते तापमान को लेकर दुनिया में भारतीय सबसे ज्यादा चिंतित
वॉशिंगटन स्थित पीयू रिसर्च सेंटर जोकि राजनीतिक, सामाजिक व भौगोलिक मुद्दों पर रिसर्च और सर्वे करता है, उसके मुताबिक धरती के बढ़ते तापमान को लेकर सबसे अधिक भारतीय चिंतित हैं, जिनकी तादात 67 प्रतिशत है। प्रदूषण में अहम योगदान देने वाले दुनिया के तीन प्रमुख देशों अमेरिका, चीन व रूस में यह संख्या काफी कम है। चीन में जहां महज 30 फीसदी लोग बढ़ते तापमान को लेकर चिंतित हैं, वहीं अमेरिका व रूस में यह संख्या 44 प्रतिशत है। वैश्विक स्तर पर होने वाली राजनीतिक उठापटक को देखें तो पाएंगे कि दुनिया की 15 फीसदी जनसंख्या वाले देश 40 फीसदी प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करते हैं। अमेरिका में प्रति व्यक्ति रोजाना बिजली की खपत करीब 1500 वाट से अधिक है, जबकि भारत में यह आंकड़ा करीब 51 वाट है।

महात्मा गांधी की किताब हिंद स्वराज में दिए नुस्खों को अपनाते तो न होते ये हालात
विकसित देशों के शिक्षित लोग विलासितापूर्ण जीवन की लालसा में प्राकृतिक संतुलन को नष्ट कर रहे हैं। इसका खामियाजा जल, जंगल, जमीन, नदी, तालाब की रक्षा करने वाले भारत के ग्रामीण बहुल समाज को भुगतना पड़ रहा है। महात्मा गांधी ने अपनी किताब हिंद स्वराज में इस असंतुलन से निपटने का नुस्खा देते हुए लिखा था कि आधुनिक विकास के चलते होने वाली पर्यावरणीय क्षति की पूर्ति संभव नहीं होगी। हिंद स्वराज में औद्योगिक सभ्यता के जिन संकटों को लेकर दुनिया को आगाह किया था उन पर अगर अपने देश में ही आजादी के बाद अमल हुआ होता तो भारत के लोगों को जलवायु परिवर्तन के ऐसे भयावह परिणाम भुगतने के नौबत नहीं आती।
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