जीरकपुर। इलाके में खनन माफिया जोर-शोर से खनन कर रहा है। वहीं इन पर विभाग द्वारा की जा रही कार्रवाई पर सवाल उठना शुरू हो गए हैं। असल में सोमवार को यहां पहुंचे अधिकारी यह साबित करने में जुटे थे कि यहां माइनिंग हाल फिलहाल के दिनों में नहीं बल्कि बहुत पहले कभी हुई होगी।
जानकारों के मुताबिक सरकार के पास सैटेलाइट इमेज से पल-पल की जानकारी है लेकिन सत्ता पक्ष के आकाओं की शह पर चल रहे माइनिंग के खेल में अधिकारियों के हाथ न चाह कर भी बंधे हुए हैं। घग्घर नदी क्षेत्र में मिट्टी और रेत का अवैध खनन अब पर्यावरण का दुश्मन बनता जा रहा है। क्षेत्र में निर्माण के चलते मिट्टी और रेत की बढ़ती जरूरत को पूरा करने के चक्कर में अब वन क्षेत्र व उससे सटी भूमि को खोदकर खोखला किया जा रहा है।
माइनिंग की स्थिति यह है कि खनन माफिया ने वन भूमि को भी नहीं छोड़ा है। कुछ महीनों में घग्घर नदी के नजदीक छतबीड़ चिड़ियाघर के पीछे माफिया ने करीब 100 एकड़ वन और सरकारी जमीन को खोद दिया। यही नहीं खनन की राह में अवरोध पैदा कर रहे 50 से ज्यादा टाहली और दूसरे वृक्षों को भी काट दिया। सुबह से शाम तक इस जमीन से खोदी जा रही रेत और मिट्टी से भरे बड़े टिप्पर दौड़ते रहते हैं लेकिन इसकी खबर राजस्व और वन अमले को नहीं है।
वैध मंजूरी की आड़ में उठा रहे फायदा
छतबीड़ चिड़ियाघर के पीछे रामपुरा घाट में राजस्व भूमि से तय स्थान और निर्धारित मात्रा में रेत खनन की मंजूरी है। वहीं अब वैध खनन की आड़ में अतिरिक्त क्षेत्र को खोदकर बेचने का काम चल पड़ा है। रेत को खोदकर बेचना खनन के नियमों के खिलाफ है लेकिन अतिरिक्त क्षेत्र से रेत चोरी करके राजस्व और खनिज विभाग दोनों के नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है।
पेड़ों की जगह अब सिर्फ ठूंठ बाकी
रामपुरा घाट के पास छत, रामपुरा, बाकरपुर, इब्राहिमपुर, बोहड़ा-बोहड़ी, जंगिरपुर, झज्जो, बासमा वाले क्षेत्रों में सुबह से शाम तक सैकड़ों ट्रालियां और टिप्पर आते-जाते हैं। इन क्षेत्रों में घग्घर के साथ लगते क्षेत्रों में मिट्टी व रेत खोदी जा चुकी है। अब आसपास के राजस्व और वन विभाग की जमीन पर भी खनन हो रहा है। यही नहीं खुदाई की राह में बाधक बने 50 से अधिक वृक्षों के काटे ठूंठ जगह-जगह नजर आ रहे हैं लेकिन पर्यावरण के लिए चुनौती बन रहे खनन माफिया को रोकने की किसी को परवाह नहीं है।